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Tuesday, 31 March 2026

अंतिम मनुष्य की डायरी

 अंतिम मनुष्य की डायरी

दिन – 1

आज

सभी नेटवर्क

हमेशा के लिए बंद हो गए।


पहले लगा

यह भी कोई अस्थायी समस्या है

रीस्टार्ट कर लेंगे,

सब ठीक हो जाएगा।


पर

कोई “रीस्टार्ट” नहीं हुआ।


दिन – 3


शहर

अचानक बहुत बड़ा लगने लगा है


इतना बड़ा

कि

उसमें मैं

खुद को नहीं ढूँढ पा रहा।


कोई आवाज़ नहीं,

कोई नोटिफिकेशन नहीं


सिर्फ़

मेरी अपनी साँसों की

अनजानी ध्वनि।


दिन – 7


आज

मैंने पहली बार

आसमान को देखा


बिना किसी फ़िल्टर के।


अजीब लगा


इतना साफ़,

इतना खाली…


जैसे

वह मुझसे कुछ पूछ रहा हो।


दिन – 10


मुझे

एक सूखा हुआ पेड़ मिला


मैंने

उसकी छाल को छुआ,


और अचानक

कुछ याद आया


शायद

इसे

“स्पर्श” कहते थे।


दिन – 14


मैंने

अपने ही दिल की धड़कन सुनी


बहुत सालों बाद।


पहले

यह शोर में दब जाती थी,

अब

यह ही एकमात्र आवाज़ है।


दिन – 18


प्यास लगी थी


पर

कोई ऐप नहीं था,

कोई बोतल नहीं थी।


मैंने

धरती को खोदा


बहुत देर तक…


फिर

थोड़ा-सा गीला मिट्टी मिला


मैं रो पड़ा।


दिन – 21


आज

मैंने खुद से बात की


बिना किसी स्क्रीन के,

बिना किसी शब्द के।


और पहली बार

मुझे लगा


कि मैं

अब तक

किसी और के साथ नहीं,

खुद से दूर था।


दिन – 25


रात को

एक सपना आया


एक नदी,

कुछ पेड़,

और

कुछ लोग…


वे

हँस रहे थे।


मैं

जागना नहीं चाहता था।


दिन – 28


आज

मेरा “लाइफ़ पैक”

खत्म होने वाला है


पर

इस बार

मैंने रिचार्ज नहीं किया।


क्योंकि

अब

मुझे समझ आ गया है


कि

ज़िंदगी

कभी खत्म नहीं होती,


बस

हम उसे

गलत तरीक़े से जीते हैं।


मैं

अपनी आख़िरी साँस के साथ

यह लिख रहा हूँ


“अगर कोई

इस डायरी को पढ़े

तो

एक पेड़ ज़रूर लगाना…

और

किसी को

बिना वजह

छू लेना।”


शायद

वहीं से

फिर शुरू होगी

दुनिया।


मुकेश ,,,,,

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