तुम और तुम्हारी गर्दन पर ठहरी धूप
तुम्हारी गर्दन पर
जब धूप आकर ठहरती है,
लगता है जैसे सुबह ने
अपना पहला ख़त
वहीं रख छोड़ा हो।
वो उजास
धीरे-धीरे सरकती है कंधों की ढलान तक,
और मैं देखता रह जाता हूँ
जैसे कोई नदी
चुपचाप सोने की हो गई हो।
तुम ज़रा-सा सिर झुकाती हो,
तो धूप की वह परत
और भी कोमल हो उठती है
मानो उजाला
तुम्हारी त्वचा से सीख रहा हो
कैसे नरम हुआ जाता है।
कभी हवा शरारत से
बालों की एक लट वहाँ बिखेर देती है,
और धूप
उस लट में उलझकर
चमकने लगती है—
जैसे किसी ने
सुनहरे धागों से
एक गुप्त कहानी बुन दी हो।
तुम्हारी गर्दन पर ठहरी धूप में
एक अजीब-सी सुकून भरी तपिश है
न जलाती है,
न चुभती है,
बस धीरे-धीरे
दिल की बर्फ़ पिघलाती है।
और मैं सोचता हूँ
अगर उजाले को
कभी किसी रूप में उतरना हो,
तो वह
तुम्हारी गर्दन पर ठहरी
उसी धूप-सा हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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