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Monday, 23 March 2026

एक रात, जो खत्म होकर भी खत्म न हुई

 एक रात, जो खत्म होकर भी खत्म न हुई


एक रात थी

जो बीत तो गई,

पर समय की तरह

कभी पूरी नहीं हुई।


घड़ी की सुइयाँ

अपने रास्ते चलती रहीं,

पर उस रात का एक पल

कहीं अटका रह गया—

मेरी धड़कनों के बीच।


तुम थीं

जैसे किसी ख्वाब की अंतिम परछाईं,

छूते ही जो टूट जाए,

पर आँखों से उतरकर

रूह में बस जाए।


हमने कुछ कहा नहीं,

बस खामोशियों ने

अपना-अपना अर्थ चुन लिया,

और वही अर्थ

अब तक बोलते रहते हैं।


रात खत्म हुई

पर उसका अँधेरा

मेरे भीतर रह गया,

जैसे कोई दीप बुझकर भी

धुआँ छोड़ता रहता है।


तुम चली गईं

पर जाने का वह क्षण

आज भी कहीं ठहरा है,

जैसे समय ने

उसे भुलाने से इंकार कर दिया हो।


यह कैसी रात थी—

जो सुबह में भी

रात ही बनी रही,

और उजाले में भी

अँधेरा छोड़ गई।


अब हर नई रात में

मैं उसी को खोजता हूँ

वही अधूरापन,

वही ठहराव,

वही तुम।


एक रात थी—

जो खत्म होकर भी

खत्म न हुई,

और शायद

कभी होगी भी नहीं।


मुकेश ,,,,,,

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