अँधेरे की बाँहों में सुलगती हुई तुम
अँधेरे की बाँहों में
तुम यूँ सिमटी थीं
जैसे रात ने
अपना सबसे गुप्त रहस्य
तुम्हारे रूप में छुपा लिया हो।
न कोई चाँद था,
न तारों की कोई गवाही,
बस एक धुँधली-सी रोशनी
तुम्हारी साँसों से उठती हुई
जो इस सन्नाटे को
धीरे-धीरे अर्थ दे रही थी।
तुम सुलग रही थीं—
किसी आग की तरह नहीं,
बल्कि उस राख की तरह
जिसमें अब भी
कहीं भीतर अंगार बाकी हो।
मैंने तुम्हें
छूना नहीं चाहा,
डर था
कि कहीं यह सुलगन
भभककर खत्म न हो जाए,
और जो बचा है
वह भी खो न जाए।
तुम्हारी खामोशी में
एक अजीब-सी पुकार थी,
जैसे कोई आवाज़
जन्म लेने से पहले ही
थक गई हो।
और मैं—
बस देखता रहा
उस अँधेरे को
जो तुम्हें ओढ़े हुए था,
और उस उजाले को
जो तुम होने के बावजूद
पूरा नहीं हो पा रहा था।
रात गुजर गई,
पर तुम वैसी ही रहीं
अधूरी, सुलगती हुई,
और अँधेरे की बाँहों में
कहीं गहराई तक उतरती हुई।
अब भी कभी-कभी
जब आँखें बंद करता हूँ
वही अँधेरा लौट आता है,
और उसमें
तुम फिर से सुलगने लगती हो।
मुकेश ,,,,,,,
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