ध्यान में घुलता हुआ स्पर्श
तुमने छुआ भी नहीं,
और मैं भीतर तक भीग गया
जैसे कोई प्रार्थना
बिना शब्दों के पूरी हो गई हो।
आँखें बंद थीं,
पर तुम्हारी मौजूदगी
किसी मंत्र-सी
नाड़ियों में उतरती रही।
यह स्पर्श देह का नहीं था,
यह तो रूह का कोई पुराना रास्ता था,
जहाँ तुम पहले से बैठे थे
और मैं बस लौट आया।
ध्यान गहराता गया,
और मैं कम होता गया,
तुम बढ़ते गए
जब तक कि
स्पर्श और साधक
दोनों एक न हो गए।
मुकेश ,,,,

No comments:
Post a Comment