आकाश और पृथ्वी के बीच प्रेम
ऋग्वैदिक ऋचाएँ कहती हैं
कभी स्वर्ग ने
पृथ्वी से प्रेम किया था।
उस प्रेम का नाम था
उर्वशी।
और पृथ्वी की धड़कनों में
जो पहली बार
स्वर्ग का संगीत उतरा,
वह था
पुरूरवा।
वह अप्सरा थी
जैसे चाँदनी
जल पर उतरती है
पर जल की नहीं होती।
वह मनुष्य था
जैसे अग्नि
धरती में जलती है
पर आकाश को छूना चाहती है।
एक दिन
दोनों मिले
और ब्रह्मांड ने देखा
कि प्रेम
न जाति पूछता है
न लोक।
पर शास्त्र कहते हैं
प्रेम जितना दिव्य होता है
उतना ही
उसमें विरह का श्राप छिपा रहता है।
उर्वशी ने कहा
“मैं स्वर्ग की हूँ,
मेरे नियम अलग हैं।”
पुरूरवा ने उत्तर दिया
“पर प्रेम का नियम
क्या स्वर्ग और पृथ्वी में
अलग-अलग होता है?”
समय बीता
और एक दिन
वह चली गई
जैसे भोर
रात से अलग हो जाती है।
तब
पुरूरवा ने जाना
प्रेम का सबसे बड़ा सत्य
मिलन नहीं,
स्मृति है।
आज भी
जब कोई मनुष्य
आकाश की ओर देखता है
और अचानक
हृदय में एक अनाम पीड़ा उठती है
तो ऋषि कहते हैं,
वह उसी पुरातन कथा की प्रतिध्वनि है—
जहाँ
स्वर्ग की एक स्त्री
और पृथ्वी का एक पुरुष
क्षण भर के लिए
अनन्त हो गए थे।
मुकेश ,,,
No comments:
Post a Comment