रूह का अदृश्य विलय
रात की तह में
एक धीमी-सी हरकत थी
जैसे कोई परछाईं
ख़ुद से ही अलग होकर
ख़ुद में ही लौट रही हो।
मैंने उसे “मैं” कहा
वो मुस्कुराई,
और बिना आवाज़
कहीं और फैल गई।
रूह
कभी जाती नहीं,
बस अपनी शक्ल बदलती है
कभी श्वास,
कभी सन्नाटा,
कभी एक अनदेखी रोशनी
जो आँख बंद करते ही
और साफ़ दिखती है।
मैंने तुम्हें
उस रोशनी में ढूँढा
पर वहाँ
कोई चेहरा नहीं था,
सिर्फ़ एक अहसास
जो
मुझे मुझसे
धीरे-धीरे
अलग कर रहा था।
सूफ़ी उसे
फ़ना कहता है
जहाँ “मैं”
एक गिरती हुई दीवार है।
और अद्वैत
उसे विलय
जहाँ दीवार कभी थी ही नहीं।
मैंने गिरना स्वीकार किया
पर गिरते हुए
कहीं ज़मीन नहीं मिली,
बस
एक असीम फैलाव—
जहाँ
हर दिशा
मुझसे ही शुरू होती थी
और मुझमें ही ख़त्म।
अब
मैं रूह नहीं रहा
न शरीर,
न नाम,
न कोई कहानी
बस एक
अनकहा-सा विस्तार हूँ,
जिसमें
तुम भी हो,
मैं भी
और वो भी
जो कभी अलग था ही नहीं।
रूह का अदृश्य विलय
कोई घटना नहीं,
एक स्मरण है
कि हम कभी बिछड़े ही नहीं थे।
मुकेश ,,,,,,
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