तर्क के बाद बचा हुआ प्रेम
बहुत देर तक
हमने प्रेम को तर्क की मेज़ पर रखा,
जैसे कोई जटिल प्रमेय हो
जिसे सिद्ध करना ज़रूरी है।
कारण पूछे गए,
परिणाम नापे गए,
भावनाओं को
परिभाषाओं में बाँधने की कोशिश हुई।
पर हर बार
किसी न किसी सूत्र के बाहर
तुम्हारी मुस्कान बच जाती थी।
हमने कहा
प्रेम का कारण बताओ।
तुमने चुप रहकर
खिड़की से आती हवा को
बालों में उलझने दिया,
और वही उत्तर था
जिसे कोई तर्क लिख नहीं सका।
बहसें चलती रहीं
क्या प्रेम
स्मृति का विस्तार है?
या देह की रसायनशाला?
या अकेलेपन का कोई
सुंदर भ्रम?
पर जब सारी दलीलें
थक कर बैठ गईं,
जब शब्द
अपने अर्थ खोने लगे,
तब जो बचा
वह एक हल्की-सी गर्माहट थी—
जैसे सर्द रात में
दो हथेलियों का मिल जाना।
तब समझ आया
तर्क रास्ता दिखाता है,
पर मंज़िल नहीं बनता।
मंज़िल तो वह है
जहाँ प्रश्न समाप्त नहीं होते,
बस
उनकी ज़रूरत कम हो जाती है।
और प्रेम
शायद वही है
जो तर्क के बाद भी
चुपचाप
दिल में बचा रह जाता है।
जैसे किसी किताब के अंत में
एक सफ़ेद पन्ना
जहाँ
कोई सूत्र नहीं लिखा,
पर
सब कुछ समझ में आ जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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