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Friday, 6 March 2026

तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो,

 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो,

जिसकी हर तान

मेरे ख़ामोश दिनों में

धीरे-धीरे उजाला भर देती है।


मैं जब भी

अपनी थकी हुई आत्मा को टटोलता हूँ,

कहीं भीतर

तुम्हारी ही कोई धुन मिलती है

अनकही,

पर पूरी।


तुम बाहर की दुनिया नहीं,

मेरे भीतर की वह आवाज़ हो

जिसे सुनकर

मैं हर बार

थोड़ा और जीवित हो जाता हूँ।


मुकेश ,,,,,,

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