प्रेम : पाप-पुण्य, पाने-खोने से परे का अनुभव
बहुत समय तक
मैंने जीवन को
दो तराज़ुओं में बाँटकर देखा—
एक में पाप और पुण्य,
दूसरे में पाना और खोना।
हर कर्म
किसी हिसाब की तरह था,
हर संबंध
किसी लाभ-हानि की तरह।
समाज ने सिखाया—
जो तुम्हें मिले वह सुख है,
जो छिन जाए वह दुख।
और धर्म ने कहा—
जो नियम में हो वह पुण्य,
जो उससे बाहर हो वह पाप।
पर एक दिन
प्रेम मेरे भीतर आया—
बिना किसी घोषणा के,
बिना किसी तर्क के।
और अचानक
दोनों तराज़ू
मेरे हाथों से गिर गए।
क्योंकि उस अनुभव में
न पाने की लालसा थी,
न खोने का भय।
तुम्हारे सामने
खड़े होकर
मैंने जाना—
प्रेम
किसी अधिकार का नाम नहीं,
न किसी उपलब्धि का।
वह तो
एक ऐसी अवस्था है
जहाँ मनुष्य
स्वयं को भी
थोड़ा भूल जाता है।
जहाँ
न पाप का डर रहता है,
न पुण्य का अहंकार।
न पाने की बेचैनी,
न खोने की पीड़ा।
बस
एक शांत अनुभव—
कि इस विशाल ब्रह्मांड में
दो चेतनाएँ
कुछ क्षणों के लिए
एक ही स्पंदन में धड़क रही हैं।
शायद इसलिए
प्रेम का सबसे गहरा सत्य यही है—
वह न तो
पाने की वस्तु है,
न खोने का दुःख।
वह तो
एक ऐसा अनुभव है
जो मनुष्य को
हर गणना से ऊपर उठाकर
अस्तित्व की
सबसे शांत
और सबसे मुक्त अवस्था में
ले जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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