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Thursday, 5 March 2026

संशय और समर्पण के बीच

 संशय और समर्पण के बीच


संशय

मन का पहला प्रश्न है

वह दरवाज़ा

जिससे होकर

ज्ञान भीतर आता है।


और समर्पण

आत्मा की अंतिम शांति

जहाँ सारे उत्तर

धीरे-धीरे

मौन में घुल जाते हैं।


मैं बहुत समय तक

संशय के साथ चला,

हर भावना से पूछा—

तुम्हारा प्रमाण क्या है?


हर धड़कन से कहा

तर्क दो,

क्यों तेज़ हो जाती हो

किसी नाम के आते ही?


पर हर बार

प्रश्नों के जंगल में

एक रास्ता

तुम्हारी ओर मुड़ जाता था।


मैंने सोचा

यह भी एक भ्रम होगा,

मन की कोई चाल।


पर तुम

जैसे किसी शांत नदी की तरह

मेरे भीतर उतरती रहीं

बिना बहस,

बिना तर्क।


और तब

मैंने पहली बार जाना

कि संशय और समर्पण

दो विरोधी तट नहीं हैं।


संशय

हमें खोजने की आग देता है,

और समर्पण

उस आग को

दीपक बना देता है।


तुम्हारे सामने

मेरे सारे प्रश्न

धीरे-धीरे शांत हो जाते हैं

जैसे आँधी के बाद

झील का पानी।


अब मैं जानता हूँ

कि प्रेम

न तो अंधा विश्वास है,

न ही अंतहीन शंका।


वह बस

संशय और समर्पण के बीच

ठहरी हुई

एक गहरी साँस है


जहाँ दिल

सोचता भी है

और

चुपचाप झुक भी जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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