मैं अब अपने ही फ़ना में गुम हूँ
मैं अब
अपने ही फ़ना में गुम हूँ
जहाँ “मैं” का हर निशाँ
धीरे-धीरे मिट रहा है,
और एक अनजानी रौशनी
अंदर उतर रही है।
न कोई चाह बची है,
न कोई शिकायत
बस एक सुकून है,
जो नाम से खाली
और एहसास से पूरा है।
मैंने ख़ुद को
तुम में नहीं,
तुम्हारे ज़रिये
उस तक पहुँचा दिया है
जहाँ मुहब्बत भी
इबादत बन जाती है।
ये जो ख़ामोशी है,
ये खालीपन नहीं
ये वही मुक़ाम है
जहाँ हर आवाज़
अपने असल में लौट जाती है।
अब मैं नहीं हूँ,
बस एक बहाव है
जो मुझे लिए जा रहा है
उस समंदर की तरफ़
जिसका कोई किनारा नहीं।
और उसी बेकनारे में
मुझे तुम्हारा निशाँ मिलता है—
जैसे फ़ना के बाद
बक़ा की पहली झलक।
मैं अब
अपने ही फ़ना में गुम हूँ…
और अजीब बात है
यहीं कहीं
मैं तुम्हें पा रहा हूँ।
मुकेश ,,
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