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Tuesday, 24 March 2026

तुम और तुम्हारे बालों में महकता हुआ गजरा

 तुम और तुम्हारे बालों में महकता हुआ गजरा


तुम और तुम्हारे बालों में

महकता हुआ गजरा—

जैसे रात ने

चाँद को अपने जूड़े में सजा लिया हो।


जब तुम गुज़रती हो,

हवा भी ठहरकर

तुम्हारी ख़ुशबू ओढ़ लेती है,

और मैं…

उसी महक में

खुद को भूल जाता हूँ।


वो सफ़ेद फूल,

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में उलझे हुए,

कुछ ऐसे लगते हैं

जैसे ख़ामोशी में लिखी हुई

कोई नर्म-सी नज़्म।


मैं पास आकर भी

कुछ कह नहीं पाता

बस उस गजरे की महक में

तुम्हारा नाम तलाशता हूँ,

और हर बार

खुद ही मिल जाता हूँ।


तुम मुस्कुरा दो तो

फूल और भी महक उठते हैं,

जैसे मुहब्बत को

अपनी ही तस्दीक़ मिल गई हो।


तुम और वो गजरा—

दोनों में एक ही बात है,

दोनों ही

मेरी रूह को छूकर

बिना आवाज़

गुज़र जाते हैं।


मुकेश ,

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