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Tuesday, 24 March 2026

वो अब मुहब्बत नहीं करना चाहती

 वो अब मुहब्बत नहीं करना चाहती


वो अब मुहब्बत नहीं करना चाहती

उसने बड़ी सादगी से कहा,

जैसे कोई

आख़िरी दीया बुझाकर

रात को लौटा दे।


मैंने कुछ भी नहीं पूछा,

बस उसकी आवाज़ में

वो थकान सुन ली

जो लफ़्ज़ों से कहीं गहरी थी।


शायद मुहब्बत

उसके लिए अब

इबादत नहीं, इम्तिहान हो गई थी

या फिर

किसी अधूरी दुआ की तरह

हर बार लौट आती थी।


मैंने उसे जाने दिया,

जैसे रेत

हथेली से खुद-ब-खुद फिसल जाती है

बिना शिकायत,

बिना आवाज़।


अब कभी-कभी

उसकी याद

एक ख़ामोश हवा बनकर आती है,

और मैं समझ जाता हूँ

कुछ लोग

मुहब्बत के लिए नहीं,

मुहब्बत को सिखाने के लिए आते हैं।


और वो…

शायद अब भी कहीं

अपने दिल को समझा रही होगी

कि मुहब्बत छोड़ देना भी

कभी-कभी

मुहब्बत ही होता है।


मुकेश ,,,,,

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