नींद की देहरी पर बैठा इंतज़ार
नींद की देहरी पर
बैठा है मेरा इंतज़ार
आँखों में हल्की-सी थकन,
और दिल में
तुम्हारा अनकहा नाम।
रात धीरे-धीरे
अपनी चादर फैलाती है,
मगर मेरी रूह
अब भी जाग रही है
तुम्हारी आहट के लिए।
कोई ख़्वाब
दस्तक देता भी है
तो मैं दरवाज़ा नहीं खोलता,
डरता हूँ—
कहीं वो तुम न हो
और मैं पहचान न पाऊँ।
हवा में जैसे
तुम्हारी ख़ुशबू ठहरी हो,
और हर सन्नाटा
तुम्हारी तरफ़ इशारा करता हो।
मैं वहीं ठहरा हूँ,
नींद और जाग के बीच
जहाँ वक़्त भी
धीमे क़दमों से गुजरता है।
शायद तुम आओ,
शायद ये इंतज़ार ही
तुम बन जाए
और मैं…
नींद की उसी देहरी पर
तुम्हारे होने का यक़ीं
ओढ़कर सो जाऊँ।
मुकेश ,,,,,,,
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