संयोग का शाश्वत सिद्धांत
कभी-कभी
मैं सोचता हूँ
क्या सचमुच
सब कुछ संयोग है?
यह मिलना,
यह पहचान,
यह अचानक
किसी अजनबी का
इतना अपना हो जाना।
यदि यह केवल संयोग है
तो फिर
यह इतना अर्थपूर्ण क्यों लगता है?
जैसे ब्रह्मांड
किसी अदृश्य गणित से
हमारी राहें जोड़ देता हो।
कितने शहर,
कितने रास्ते,
कितने अनगिनत लोग—
और फिर भी
किसी एक क्षण में
हम दोनों का मिल जाना।
क्या यह सचमुच
केवल संभावना थी?
या समय की किसी गहरी योजना का
मौन परिणाम?
जब तुम सामने आती हो
तो लगता है
मानो अनगिनत घटनाएँ
एक ही बिंदु पर आकर
ठहर गई हों।
जैसे वर्षों से बहती हुई नदियाँ
अचानक
एक ही समुद्र में उतर जाएँ।
तब समझ आता है—
संयोग केवल
अनिश्चितता नहीं है,
वह कभी-कभी
ब्रह्मांड का सबसे सूक्ष्म विधान होता है।
शायद
संयोग का शाश्वत सिद्धांत यही है—
कि इस विशाल सृष्टि में
जहाँ सब कुछ बिखरा हुआ लगता है,
वहीं कहीं
दो जीवन
धीरे-धीरे
एक-दूसरे की ओर बढ़ते रहते हैं।
और जब वे मिलते हैं
तो लगता है—
जैसे ब्रह्मांड ने
बहुत पहले ही
यह क्षण लिख दिया था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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