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Tuesday, 17 March 2026

तुम्हारा मेरी बातों को सुनते हुए “हूँ” कहना

 तुम्हारा मेरी बातों को सुनते हुए “हूँ” कहना


मैं बोलता रहता हूँ

कभी किसी छोटी-सी बात पर,

कभी यूँ ही

बिना वजह।


और तुम

चुपचाप सुनती रहती हो

बस कभी-कभी

धीरे से

“हूँ” कह देती हो।


तुम्हारा वह “हूँ”

कोई जवाब नहीं होता,

मगर उसमें

एक नरम-सी रज़ामंदी होती है,

जैसे तुम

मेरी हर बात को

अपनी ख़ामोशी में

जगह दे रही हो।


कभी लगता है

मेरी सारी बातें

इतनी ज़रूरी भी नहीं,

पर तुम्हारा

यूँ सुनते रहना

और बीच-बीच में

हल्का-सा “हूँ” कहना


मेरे दिन को

एक अजीब-सी

मोहब्बत से

भर देता है।


मुकेश ,,,,,,

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