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Wednesday, 4 March 2026

तुम और तुम्हारी चोटी में उलझी हुई हवा

 तुम और तुम्हारी चोटी में उलझी हुई हवा


तुम्हारी चोटी में

जब हवा आकर अटक जाती है,

लगता है जैसे किसी शरारती बादल ने

अपना रास्ता वहीं भूल लिया हो।


वो लटों के बीच

धीरे-धीरे सरकती है,

और तुम्हारी चोटी

मानो किसी नदी की तरह

लहराकर उत्तर देती है।


तुम ज़रा-सा मुड़कर देखती हो,

तो हवा और बेक़रार हो उठती है

एक गुप्त संवाद-सा

जो सिर्फ़ तुम्हारे बाल समझते हैं।


मैंने अक्सर देखा है,

तुम्हारी चोटी

सिर्फ़ बँधी हुई नहीं होती

उसमें एक खुला आसमान छुपा रहता है,

जहाँ हर झोंका

अपना नाम लिख जाता है।


कभी तुम उसे आगे ले आती हो,

तो हवा पीछे-पीछे चली आती है

जैसे उसे डर हो

कि कहीं वह मोहब्बत का

अपना ठिकाना न खो दे।


तुम और तुम्हारी चोटी में उलझी हवा

दोनों मिलकर

एक ऐसा मौसम रचते हो,

जहाँ ठहराव भी लहराता है

और लहर भी

सुकून दे जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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