अँधेरे और उजाले के बीच
उम्मीद की एक झिरी
अँधेरा
पूरी तरह घिर आया था
जैसे सब कुछ
धीरे-धीरे
अपने ही भीतर डूब रहा हो।
उजाला
कहीं दूर खड़ा था,
थोड़ा-सा झिझकता हुआ—
जैसे आने से पहले
कुछ सोच रहा हो।
और इनके बीच
एक बहुत पतली-सी झिरी थी
जहाँ से
हल्की-सी रोशनी
अंदर आती रही।
तुमने
बस उतना-सा हाथ बढ़ाया,
और मैं
उसी झिरी के सहारे
तुम तक पहुँच गया।
तब समझ आया—
उम्मीद
कभी पूरी रोशनी नहीं होती,
वो बस
इतनी-सी जगह होती है
जहाँ से
हम एक-दूसरे को
देख सकें।
मुकेश ,,
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