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Thursday, 26 March 2026

अँधेरे और उजाले के बीच

 अँधेरे और उजाले के बीच

उम्मीद की एक झिरी


अँधेरा

पूरी तरह घिर आया था

जैसे सब कुछ

धीरे-धीरे

अपने ही भीतर डूब रहा हो।


उजाला

कहीं दूर खड़ा था,

थोड़ा-सा झिझकता हुआ—

जैसे आने से पहले

कुछ सोच रहा हो।


और इनके बीच

एक बहुत पतली-सी झिरी थी

जहाँ से

हल्की-सी रोशनी

अंदर आती रही।


तुमने

बस उतना-सा हाथ बढ़ाया,

और मैं

उसी झिरी के सहारे

तुम तक पहुँच गया।


तब समझ आया—

उम्मीद

कभी पूरी रोशनी नहीं होती,

वो बस

इतनी-सी जगह होती है

जहाँ से

हम एक-दूसरे को

देख सकें।


मुकेश ,,

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