न्यायसूत्र” के प्रथम सूत्र पर एक शोधात्मक नज़्म
प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डा-हेत्वाभास-छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः।
कभी
ज्ञान के प्राचीन वन में
एक ऋषि ने
प्रश्न की आग जलाई थी—
और कहा,
मोक्ष
अंधविश्वास से नहीं,
तत्त्वज्ञान से आता है।
उन्होंने
ज्ञान के रास्ते पर
सोलह दीप रखे—
प्रमाण,
जिससे सत्य का द्वार खुलता है।
प्रमेय,
जिसे जानने के लिए
मन अपनी यात्रा शुरू करता है।
संशय,
जो अज्ञान का दोष नहीं,
ज्ञान की पहली हलचल है।
प्रयोजन,
जो हर प्रश्न के पीछे
छुपा हुआ कारण है।
दृष्टान्त,
जहाँ अनुभव
तर्क का साक्षी बनता है।
सिद्धान्त,
जहाँ विचार
अंततः अपना घर पाता है।
फिर
तर्क की रचना हुई—
अवयव,
वाक्यों की सीढ़ियाँ।
तर्क,
मन की प्रयोगशाला।
निर्णय,
जहाँ संदेह
धीरे-धीरे शांत हो जाता है।
पर ऋषि ने चेताया भी—
विवाद के जंगल में
वाद, जल्प और वितण्डा
तीन अलग रास्ते हैं।
कुछ रास्ते
सत्य तक पहुँचते हैं,
और कुछ
केवल जीत तक।
फिर
उन्होंने दिखाए
तर्क के भ्रम
हेत्वाभास,
जहाँ कारण
सिर्फ़ कारण जैसा लगता है।
छल और जाति,
जहाँ बुद्धि
अपने ही जाल में उलझ जाती है।
और अंत में
निग्रहस्थान
जहाँ
तर्क की सीमा स्वीकार करनी पड़ती है।
ऋषि मुस्कुराए—
“इन सबका
तत्त्वज्ञान जान लो,
तो ज्ञान
सिर्फ़ विचार नहीं रहेगा—
वह बन जाएगा
निःश्रेयस का मार्ग।”
इस तरह
न्याय का पहला सूत्र
सिर्फ़ दर्शन नहीं,
ज्ञान की एक पूरी
मानचित्रिका है
जहाँ
प्रश्न से शुरू होकर
मनुष्य
मोक्ष तक पहुँचता है।
— मुकेश
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