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Friday, 6 March 2026

न्याय-दर्शन : एक नज़्म

 न्याय-दर्शन : एक शोधात्मक नज़्म

जब दुनिया
सिर्फ़ अनुभूतियों की धुंध थी,
और सत्य
अभी शब्दों में उतरना सीख रहा था,
तभी कहीं
तर्क की पहली मशाल जली
जिसे हम
न्याय कहते हैं।

यह सिर्फ़ वाद-विवाद नहीं,
ज्ञान की वह पगडंडी है
जहाँ
प्रमाण
अनुमान के हाथ पकड़कर
सत्य तक पहुँचते हैं।

यहाँ
प्रत्यक्ष
आँखों का विश्वास है,
अनुमान
मन की दूरबीन,
उपमान
स्मृति की तुलना,
और शब्द
ऋषियों की आवाज़ में
छिपा हुआ प्रमाण।

महर्षि गौतम ने
तर्क के इन छोटे-छोटे कणों से
एक पूरा आकाश रचा,
जहाँ
संदेह भी स्वागतयोग्य है
और प्रश्न
ज्ञान की पहली सीढ़ी।

न्याय कहता है
सत्य
किसी एक भावना का निर्णय नहीं,
वह तो
विचारों के बीच
धीरे-धीरे उगता हुआ
एक निष्कर्ष है।

और तब
जब मन
प्रमाणों की अग्नि से
अपनी भ्रांतियाँ जला देता है,
तभी
ज्ञान
मुक्ति की दिशा में
पहला कदम रखता है।

इस तरह
तर्क
सिर्फ़ बुद्धि का खेल नहीं रहता,
वह बन जाता है—
आत्मा की यात्रा,
जहाँ
सत्य की खोज
धीरे-धीरे
मोक्ष के द्वार तक पहुँचती है।

यही
न्याय-दर्शन का संगीत है
जहाँ
प्रश्न
ऋचा बन जाते हैं
और
तर्क
एक मौन उपनिषद।

मुकेश

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