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Saturday, 14 March 2026

राजमहल की छाया में प्रेम

 राजमहल की छाया में प्रेम

इतिहास कहता है

राजमहल केवल

राजनीति के घर नहीं होते,

कभी-कभी

वहाँ प्रेम भी

संकोच की तरह जन्म लेता है।


विदिशा के महल में

एक दिन

अग्निमित्र ने देखा

जैसे कोई राग

अचानक मूर्त हो गया हो।


वह मालविका थी

नृत्य की लय में बसी हुई,

जैसे संस्कृत के किसी श्लोक में

छिपा हुआ सौंदर्य।


राजा ने सोचा

“यह केवल एक नर्तकी है।”

पर हृदय ने कहा

“नहीं,

यह तो उस सौंदर्य का रूप है

जिसे कवि

उपमा खोजते-खोजते भी

पूरा नहीं कह पाते।”


नाट्यशास्त्र बताता है

श्रृंगार रस

केवल आँखों से नहीं,

संकोच से जन्म लेता है।


इसलिए

मालविका की झुकी हुई दृष्टि में

एक पूरा काव्य था,

और अग्निमित्र की बेचैनी में

एक अधूरा श्लोक।


राजमहल की दीवारें

सब कुछ जानती थीं

कैसे

एक दृष्टि

धीरे-धीरे

प्रेम का इतिहास बन जाती है।


और तब

समय ने सिद्ध किया


कि कभी-कभी

राजा का हृदय भी

एक साधारण मनुष्य की तरह

बस इतना ही चाहता है


कि

कोई उसे

सत्ता से नहीं,

प्रेम से पहचाने।


मुकेश ,,,,,

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