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Wednesday, 18 March 2026

ख़ामोशी में भीगती हुई मोहब्बत

 ख़ामोशी में भीगती हुई मोहब्बत


हम कुछ नहीं बोले

बस पास बैठे रहे,

और बाहर

हल्की-हल्की बारिश

खिड़की पर उतरती रही।


तुम्हारी ख़ामोशी में

एक अजीब-सी नरमी थी,

जैसे हर अनकहा लफ़्ज़

भीगकर

दिल तक पहुँच रहा हो।


मैंने कुछ कहना चाहा,

मगर उस पल

लफ़्ज़ ज़रूरी नहीं थे

तुम्हारी आँखों की नमी

सब कुछ कह रही थी।


शायद

मोहब्बत हमेशा

शोर में नहीं होती,

कभी-कभी

वो यूँ ही

ख़ामोशी में

धीरे-धीरे भीगती रहती है


मुकेश ,,,,

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