अहिल्याबाई होल्कर
पत्थरों में बसती हुई करुणा
इतिहास में
कुछ नाम
तलवार की चमक से नहीं,
प्रार्थना की शांति से याद किए जाते हैं।
अहिल्याबाई
ऐसा ही एक नाम है
एक स्त्री
जिसने राजसिंहासन को
राज नहीं,
सेवा का आसन समझा।
जब समय ने
उससे उसका पुत्र
और उसका पति छीन लिया,
तब
दुनिया ने सोचा
अब वह टूट जाएगी।
पर
वह टूटी नहीं,
वह एक नदी बन गई—
जो
अपने दुःख को
लोककल्याण में बहा देती है।
कहते हैं
उसने मंदिर बनवाए,
घाट बनवाए,
तीर्थों को फिर से जीवन दिया।
पर सच तो यह है—
वह पत्थरों को नहीं,
आस्था को गढ़ रही थी।
काशी के घाटों पर
जब गंगा
संध्या की रोशनी में चमकती है,
तो लगता है
जैसे किसी दूर खड़ी स्त्री की
मौन प्रार्थना
आज भी जल में उतर रही हो।
इतिहास के पन्ने
धीरे से कहते हैं—
कुछ लोग
साम्राज्य नहीं बनाते,
वे
समय की आत्मा को
थोड़ा और करुणामय
बना जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,
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