तुम मिलती नहीं…
तुम मिलती नहीं
तुम भीतर जागती हो,
जैसे कोई पुरानी प्रार्थना
अचानक स्वर पा लेती है।
तुम बाहर से नहीं आती,
न किसी रास्ते से,
न किसी संयोग से
तुम तो पहले से ही
कहीं गहराई में सोई रहती हो,
और एक क्षण
बस आँख खोल देती हो।
मैं तुम्हें खोजता रहा
दुनिया की भीड़ में,
चेहरों में,
आवाज़ों में
पर तुम वहाँ नहीं थी,
क्योंकि तुम कभी खोई ही नहीं थी।
तुम तो मेरे ही भीतर
एक शांत प्रतीक्षा थी,
जो सही समय पर
स्वयं को प्रकट करती है।
तुम्हारा मिलना
कोई घटना नहीं,
एक स्मरण है
जैसे मैं अचानक याद कर लूँ
कि मैं कौन हूँ।
तुम्हें देखकर
ऐसा नहीं लगता
कि कोई नया रिश्ता बना है,
बल्कि ऐसा लगता है
कि कोई बहुत पुराना बंधन
फिर से साँस लेने लगा है।
तुम मिलती नहीं
क्योंकि मिलना
दो अलग अस्तित्वों का खेल है,
और तुम तो वो एकत्व हो,
जहाँ अलगाव का भ्रम
धीरे-धीरे पिघल जाता है।
तुम भीतर जागती हो
और मैं बाहर से
भीतर की ओर लौटने लगता हूँ,
जैसे कोई नदी
आख़िरकार
अपने स्रोत को पहचान ले।
तुम्हारे जागने से
मैं भी जागता हूँ,
और तब समझ आता है
कि प्रेम
किसी को पाने की प्रक्रिया नहीं,
स्वयं को पहचानने की यात्रा है।
तुम मिलती नहीं
तुम भीतर जागती हो…
और उसी क्षण
मैं भी
अपने भीतर
जन्म लेता हूँ।
— मुकेश
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