“तुम वो ठहराव हो…”
तुम वो ठहराव हो,
जहाँ हर बेचैनी
विश्राम मांगती है
जैसे लंबी यात्रा के बाद
थका हुआ पथिक
अचानक किसी वृक्ष की छाँव पा ले,
और बिना कुछ सोचे
बस बैठ जाए…
तुम्हारे पास आकर
मन सवाल नहीं करता,
वो धीरे-धीरे
उत्तर बनने लगता है।
जो हलचल भीतर चलती रहती थी,
जो अनकही दौड़
हर क्षण मुझे खींचती थी
तुम्हारी एक झलक से
वो सब थमने लगता है।
तुम कोई मंज़िल नहीं,
न ही कोई रास्ता
तुम वो विराम हो,
जहाँ चलना भी
एक शांति बन जाता है।
तुम्हारी आँखों में
कोई आग्रह नहीं,
कोई पुकार नहीं
फिर भी एक खिंचाव है,
जो हर भटकी हुई धड़कन को
अपने पास बुला लेता है।
मैं तुम्हें पाना नहीं चाहता,
क्योंकि तुम्हारे पास
कुछ पाने की चाह ही
धीरे-धीरे विलीन हो जाती है।
बस यूँ लगता है
कि जो भी अधूरा था,
जो भी टूटा हुआ था,
वो तुम्हारी खामोशी में
खुद ही जुड़ रहा है।
तुम्हारे पास
मैं कुछ करता नहीं,
कुछ बनता नहीं
मैं बस
होने लगता हूँ।
और शायद यही
सबसे गहरा विश्राम है
जहाँ कोई प्रयास नहीं,
कोई पहचान नहीं,
बस एक मौन स्वीकार है…
तुम वो ठहराव हो,
जहाँ हर बेचैनी
आख़िरकार
खुद को छोड़ देती है।
— मुकेश
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