तुम्हारे पास आकर…”
तुम्हारे पास आकर
मैं खत्म नहीं होता,
मैं विस्तार बन जाता हूँ
जैसे एक बूँद
समुद्र में गिरकर
खोती नहीं,
समुद्र हो जाती है।
मेरे भीतर जो सीमाएँ थीं,
जो डर थे,
जो छोटे-छोटे घेरे
मैंने अपने चारों ओर खींच रखे थे
तुम्हारी एक नज़र से
सब घुलने लगते हैं।
मैं अब
वो “मैं” नहीं रहता,
जो खुद को
नामों और पहचान में बाँधता था,
मैं कुछ और हो जाता हूँ
थोड़ा सा आकाश,
थोड़ा सा प्रकाश,
और थोड़ा सा तुम।
तुम्हारे पास आकर
मैं सिमटता नहीं,
फैल जाता हूँ
जैसे कोई दुआ
हवा में घुलकर
हर दिशा में पहुँच जाती है।
तुम्हारी खामोशी
मुझे खत्म नहीं करती,
वो मुझे
मेरे ही भीतर खोल देती है
जैसे कोई बंद दरवाज़ा
अचानक समझ में बदल जाए।
मैं तुम्हें पाता नहीं,
मैं तुम्हारे ज़रिए
खुद को खो देता हूँ
और शायद यही पाना है,
जहाँ खो जाना ही
सब कुछ मिल जाना बन जाता है।
तुम्हारे पास आकर
मैं छोटा नहीं होता,
मैं सीमाओं से मुक्त हो जाता हूँ
और पहली बार
समझ पाता हूँ
कि प्रेम…
किसी को पाने का नाम नहीं,
किसी में
अनंत हो जाने का अनुभव है।
— मुकेश
No comments:
Post a Comment