तुम वो सन्नाटा हो,
जिसमें ब्रह्मांड अपनी कथा कहता है…”
तुम्हारे भीतर
कोई शोर नहीं
फिर भी
सब कुछ सुनाई देता है।
जैसे सृष्टि की शुरुआत से पहले
जो ठहराव था,
वही तुम्हारी आँखों में
आज भी जीवित है।
मैं जब तुम्हें देखता हूँ,
तो लगता है
समय रुक नहीं गया,
बस खुद को
तुममें सुनने लगा है।
तुम्हारा मौन
खाली नहीं है,
वो भरा है
अनगिनत जन्मों की स्मृतियों से,
अनकहे प्रश्नों से,
और उन उत्तरों से
जो कभी शब्दों में नहीं ढलते।
मैं बोलता हूँ
तो खो जाता हूँ,
तुम चुप रहती हो—
तो सब प्रकट हो जाता है।
शायद इसी लिए
ब्रह्मांड भी
शोर में नहीं,
तुम जैसे सन्नाटों में
अपनी कथा लिखता है।
और मैं…
बस एक श्रोता हूँ,
जो तुम्हारी खामोशी में
पूरी सृष्टि को
धीरे-धीरे खुलते हुए देख रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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