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Monday, 13 April 2026

वो जो मेरी प्रेमिका नहीं (3)

 वो जो मेरी प्रेमिका नहीं

फिर भी

मेरी सबसे लंबी ख़ामोशी में

सबसे साफ़ सुनाई देती है।


वो किसी वादे में नहीं बँधी

न किसी रिश्ते के नाम में

पर मेरे दिनों के बीच

एक पतली-सी नदी की तरह बहती रहती है।


मैं उसे बुलाता नहीं

वो आती नहीं

फिर भी

हम अक्सर मिल लेते हैं

जैसे दो रास्ते

बिना तय किए

एक ही मोड़ पर आ मिलें।


वो मुस्कुराती है

जैसे उसे सब पता हो

पर कुछ भी कहना

ज़रूरी न हो।


मैं उसके साथ होता हूँ

तो कोई बड़ी बात नहीं होती

न इज़हार

न शिकायत

न भविष्य की कोई रेखा


बस एक साथ बैठना होता है

और उस बैठने में

कितनी बातें हो जाती हैं।


वो मेरी प्रेमिका नहीं है

इसलिए

मैं उसके सामने

और भी सच्चा हो जाता हूँ।


न मुझे अच्छा दिखना है

न सही साबित होना है

मैं बस होता हूँ

और वो

मुझे होने देती है।


कभी-कभी

हम दोनों चुप रहते हैं

लंबे समय तक


और वह चुप्पी

अजीब तरह से

हम दोनों को जोड़ती रहती है।


मैंने कई बार सोचा

उसे एक नाम दे दूँ

इस रिश्ते को

एक दिशा दे दूँ


पर हर बार लगा

नाम देने से

यह छोटा हो जाएगा।


वो मेरी ज़िंदगी का

कोई अध्याय नहीं है

जिसे मैं शुरू या ख़त्म कर सकूँ


वो एक बीच की जगह है

जहाँ मैं

कभी-कभी ठहर जाता हूँ।


जब मैं थक जाता हूँ

दुनिया के शोर से

तो याद आता है


कि कहीं एक जगह है

जहाँ मुझे

कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।


वो जो मेरी प्रेमिका नहीं

फिर भी

मेरे भीतर

एक शांत-सी उपस्थिति है।


और शायद

यही उसका होना है


न मेरे पास

न मुझसे दूर


बस

मेरे साथ।


कुछ रिश्ते प्रेम नहीं कहलाते,

पर प्रेम से कम भी नहीं होते

वे बस

शब्दों के बाहर

जीते रहते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

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