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Friday, 17 April 2026

तदेजति तन्नैजति…” — शांकरभाष्य-व्याख्या का समग्र सार

 तदेजति तन्नैजति…” — शांकरभाष्य-व्याख्या का समग्र सार

सरल समन्वित अर्थ (मन्त्र का भाव)

वह ब्रह्म चलता हुआ भी प्रतीत होता है और नहीं भी चलता; वह दूर भी है और अत्यन्त निकट भी; वह सबके भीतर भी है और बाहर भी। वह मन, इन्द्रियों आदि से परे, नित्य चैतन्यस्वरूप, सर्वव्यापक और अविकार है।

शांकरभाष्य के पदों का सार (संक्षिप्त विवेचन)

इस सम्पूर्ण भाष्य-चर्चा का केंद्रीय तत्त्व यह है कि ब्रह्म एक ही होते हुए भी विभिन्न दृष्टिकोणों से भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुभूत होता है, और यही कारण है कि उपनिषद् में उसके लिए विरोधाभासी प्रतीत होने वाले वचन प्रयुक्त होते हैं।

शंकराचार्य का मुख्य प्रतिपादन यह है कि

ब्रह्म अपने निरुपाधिक स्वरूप में सदा अचल, अविकार, एकरस और नित्य चैतन्य है—वह कहीं नहीं जाता, न उसमें कोई क्रिया होती है।

किन्तु उपाधियों (शरीर, मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि) के कारण वही ब्रह्म चलता हुआ, क्रियाशील और अनेक रूपों में विभक्त प्रतीत होता है।

“मनसो जवीयः” आदि पदों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि ब्रह्म की “तीव्रता” वास्तव में उसकी सर्वव्यापकता है—मन जहाँ भी पहुँचता है, वहाँ ब्रह्म पहले से ही विद्यमान है। अतः वह मन से भी “अधिक तीव्र” कहा गया है।

इन्द्रियाँ (देव) उसे नहीं जान सकतीं, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है—जो सबको प्रकाशित करता है, वह स्वयं किसी अन्य साधन का विषय नहीं बन सकता। मन भी उसे केवल आभास रूप में ग्रहण करता है, वस्तु रूप में नहीं।

“तद् दूरे तद्वन्तिके”—इसका अर्थ है कि अज्ञानी के लिए ब्रह्म अत्यन्त दूर है, क्योंकि वह उसे बाह्य वस्तु के रूप में खोजता है; परन्तु ज्ञानी के लिए वही ब्रह्म अत्यन्त समीप—स्वयं के आत्मस्वरूप के रूप में—प्रकट होता है।

आगे यह प्रतिपादित हुआ कि ब्रह्म केवल दूर और निकट ही नहीं, बल्कि सर्वान्तर (भीतर) और सर्वव्यापक (बाहर) भी है—आकाश के समान।

यह सम्पूर्ण जगत्—जो नाम, रूप और क्रिया से युक्त है—उसी ब्रह्म में स्थित है और उसी पर आश्रित है।

“मातरिश्वा” (प्राणशक्ति) आदि के माध्यम से यह दिखाया गया कि समस्त क्रियाएँ—प्राणियों की चेष्टाएँ, अग्नि का दहन, सूर्य का प्रकाश, वर्षा आदि—सब उसी ब्रह्माधिष्ठान में घटित होती हैं, यद्यपि ब्रह्म स्वयं अविक्रिय रहता है।

अंततः ब्रह्म को “प्रज्ञानघन” कहा गया—अर्थात् वह शुद्ध, अखंड, निरंतर चैतन्य है, जिसमें कोई भेद या परिवर्तन नहीं है।

इस मन्त्र और उसके शांकरभाष्य का सार यह है कि ब्रह्म एकमात्र सत्य है—नित्य, सर्वव्यापक, अविकार और चैतन्यस्वरूप। संसार में जो गति, भेद और क्रिया दिखाई देती है, वह केवल उपाधि और अविद्या के कारण है। ज्ञानी इस भेद को समझकर ब्रह्म को अपने ही आत्मस्वरूप में अनुभव करता है, और यही अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष है।


मुकेश ,,,,

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