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Monday, 27 April 2026

तुम जब होंठों को हल्का-सा गोल करती हो,

 तुम—आईने के सामने

तुम जब

होंठों को हल्का-सा गोल करती हो,

और एक ध्यान से

लिपस्टिक के शेड को बराबर करती हो

जैसे कोई रेखा

अपने अर्थ को ठीक कर रही हो।

आईना तुम्हें देखता है,

और तुम

आईने में खुद को

दोनों के बीच

एक छोटी-सी, निजी-सी बातचीत चलती है।

तुम्हारी उँगलियों की ठहरन,

होंठों की वो एकाग्रता,

और आँखों में

खुद को परखने की वो आदत

सब कुछ मिलकर

एक बहुत सादा, बहुत अपना-सा दृश्य बनाते हैं।

और सच

उस पल में

तुम्हारी कोई बनावट नहीं रहती,

बस एक सहजता होती है,

एक हल्की-सी मासूमियत,

जो बिना कोशिश के ही दिख जाती है।

तुम शायद बस

एक शेड ठीक कर रही होती हो,

पर उस एक छोटे-से काम में

तुम पूरी की पूरी

अपने आप में सिमट आती हो

और वही तुम्हें

खूबसूरत बना देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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