गिल्ली-डंडा और कंचों का खिलाड़ी
1.
कहाँ गई वो नीम की छाँव,
कहाँ गया धूल का मैदान,
कहाँ गए वो टेढ़े-मेढ़े डंडे,
कहाँ गई गिल्ली की उड़ान
और कहाँ गए मेरे यार
जो सुबह से शाम तक
धरती को आकाश बना देते थे
हाय!
यह मोबाइल
फिर खा गया
एक पूरा बचपन!
2.
मैं तो
गिल्ली को मारकर
आसमान में उछाल देता हूँ
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
किसकी छत पर गिरेगी,
कौन झगड़ा करेगा,
या
कौन उसे अपनी जीत मानेगा!
3.
एक लड़का था
जो डंडा ठीक से नहीं पकड़ता था,
हर बार हार जाता था
पर
वही सबसे ज़्यादा हँसता था
एक दिन
वह लड़का
खेल से बड़ा हो गया
और
हँसी छोटी।
4.
कंचों से
उँगलियाँ छिलवा कर समझा हूँ
ज़िन्दगी का यह उसूल
निशाना
सिर्फ़ आँख से नहीं लगता,
थोड़ा दिल भी चाहिए!
अरे नए खिलाड़ियों!
खेलने से पहले
झुकना सीखो!
5.
गिल्ली उड़ाने से पहले
डंडा साधना सीखो
डंडा साधने से पहले
ज़मीन पहचानो
ज़मीन पहचानने से पहले
हार मानना सीखो
और
कुछ भी सीखने से पहले
दोस्त बनाना सीखो!
6.
मैंने
मंदिर के चबूतरे से
मस्जिद की दीवार तक
गिल्ली उड़ाई है
और
कंचे खेले हैं
हर जात, हर मज़हब के साथ
मुझे मत सिखाओ
क्या होता है
बराबरी!
7.
कंचे जीतने वाले बच्चे से पूछो
अर्थशास्त्र का मतलब
और वह
अपनी जेब खनका दे
तो समझ लेना
पूरी दुनिया
उसकी मुट्ठी में है!
8.
हर बार
जब किसी का कंचा जीता
उससे आँख नहीं मिला पाया
और
हर बार
जब हार गया
थोड़ा और
खुद से मिल गया!
9.
ज़िन्दगी
एक खोया हुआ कंचा है
कभी मिट्टी में मिल जाता है,
कभी जेब में खनकता है
मूर्ख
उसे खेल समझते हैं,
समझदार
उसे बचपन कहते हैं!
10.
ऐसे भी अमीर लोग हैं
जिनके बच्चों ने
कभी गिल्ली-डंडा नहीं खेला
और ऐसे भी गरीब
जिनके पास कुछ नहीं
पर
पूरा मोहल्ला
उनका मैदान है!
11.
मेरे दोस्तो!
खेलना छोड़ मत देना
वरना
जीतने का मतलब भूल जाओगे!
मेरे दोस्तो!
खेलते रहना
क्योंकि
जब तक गिल्ली हवा में नहीं उड़ेगी
तुम्हें
धरती की कीमत समझ नहीं आएगी!
मुकेश ,,,,,,,,,
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