विधि–निषेध के प्रत्यक्ष-विरोध और शास्त्र-समन्वय: कर्म–विद्या-विचार में शांकर-प्रक्रिया”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“अविरोधोऽपि। यथा च ‘न हिंस्यात् सर्वा भूतानि’ इति चाक्षरादवगतम्, पुनः शास्त्रेण एव बाध्यते—‘अध्वरे पशुं हिंस्यात्’ इति। एवं …”
अन्वय
अविरोधः अपि (शास्त्रात् एव ज्ञेयः)।
यथा च ‘न हिंस्यात् सर्वा भूतानि’ इति (वाक्यात्) अवगतम्, पुनः शास्त्रेण एव बाध्यते—‘अध्वरे पशुं हिंस्यात्’ इति। एवं (इहापि तद्वत् विचारणीयम्)।
जैसे “किसी भी प्राणी को हिंसा नहीं करनी चाहिए”—यह सामान्य नियम है, परन्तु शास्त्र ही यह भी कहता है कि “यज्ञ में पशु की हिंसा की जाए।”
इस प्रकार जो पहले निषेध था, वही दूसरे सन्दर्भ में शास्त्र द्वारा ही परिवर्तित (अपवाद सहित) किया जाता है।
इसी प्रकार यहाँ भी विरोध और अविरोध का निर्णय शास्त्र के अनुसार ही करना चाहिए।
यहाँ शंकराचार्य एक अत्यन्त सूक्ष्म और महत्वपूर्ण न्याय प्रस्तुत करते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि—
विरोध और अविरोध का निर्णय केवल प्रत्यक्ष या तर्क से नहीं, अपितु शास्त्र से ही होता है।
“अविरोधोऽपि”—प्रस्तावना
पूर्व में कहा गया कि—
कर्म और विद्या में विरोध है
अतः समुच्चय असम्भव है
अब कोई यह आपत्ति कर सकता है—
“क्या कभी विरोध के भीतर भी अविरोध सम्भव नहीं?”
अर्थात्—
जो प्रत्यक्ष रूप से विरोधी प्रतीत हो,
क्या वह शास्त्र के द्वारा समन्वित नहीं हो सकता?
उदाहरण—विधि और निषेध
“यथा ‘न हिंस्यात् सर्वा भूतानि’”—
यह एक सामान्य निषेध-वाक्य है—
“किसी भी प्राणी की हिंसा न करें।”
यह धर्म का सार्वभौम सिद्धान्त प्रतीत होता है।
“पुनः ‘अध्वरे पशुं हिंस्यात्’”—
परन्तु वही शास्त्र यज्ञ के सन्दर्भ में कहता है—
“यज्ञ में पशु की हिंसा करनी चाहिए।”
यह एक विधि-वाक्य है।
प्रत्यक्ष विरोध
यहाँ स्पष्ट रूप से विरोध दिखता है—
एक ओर—हिंसा का निषेध
दूसरी ओर—हिंसा का विधान
यदि केवल तर्क से देखें, तो यह असंगत प्रतीत होगा।
शास्त्र-समन्वय
किन्तु शंकराचार्य का सिद्धान्त है—
दोनों ही वाक्य शास्त्रप्रमाणक हैं, अतः दोनों सत्य हैं।
कैसे?
“न हिंस्यात्” → सामान्य नियम (सर्वसामान्य धर्म)
“अध्वरे हिंस्यात्” → विशेष अपवाद (यज्ञ-विशेष)
अतः—
विशेष विधि, सामान्य निषेध का अपवाद बन जाती है।
तात्त्विक निष्कर्ष
इस उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि—
विरोध और अविरोध का निर्णय सन्दर्भ (प्रकरण) और शास्त्र के आधार पर किया जाना चाहिए।
कर्म–विद्या-विवाद में अनुप्रयोग
इसी प्रकार—
कर्म और विद्या प्रथम दृष्टि में विरोधी प्रतीत हो सकते हैं
किन्तु उनका स्थान और प्रयोजन भिन्न है
अतः—
कर्म → चित्तशुद्धि के लिए
उपासना → एकाग्रता के लिए
ज्ञान → मोक्ष के लिए
यहाँ विरोध नहीं, बल्कि क्रम है।
अद्वैत सिद्धान्त की पुष्टि
यह समस्त विवेचन अन्ततः यह स्थापित करता है कि—
शास्त्र ही अंतिम प्रमाण है
और उसी के अनुसार साधन-क्रम को समझना चाहिए
जब यह क्रम पूर्ण होता है, तब—
ज्ञान उदित होता है
और उस ज्ञान में—
न विधि
न निषेध
न कर्ता
न कर्म
केवल—
अद्वैत ब्रह्म
यह पदांश हमें यह शिक्षा देता है कि—
“शास्त्र-वाक्यों में दिखने वाला विरोध, वास्तव में सन्दर्भानुसार समन्वित होता है।”
अतः—
तर्क या प्रत्यक्ष के आधार पर निर्णय न करके
शास्त्र के सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में अर्थ ग्रहण करना चाहिए
यही शांकर-वेदान्त की युक्तिसंगत पद्धति है—
जहाँ विरोध भी शास्त्र से सिद्ध होता है, और उसका समाधान भी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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