धर्म और मोबाइल का संवाद
मोबाइल!
मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ
तुम बुरा मत मानना
क्योंकि आजकल
तुम ही सबसे बड़े पुजारी बन बैठे हो…
मोबाइल (हँसकर):
धर्म जी!
समय बदल गया है
अब लोग
मंदिर कम
मुझे ज़्यादा खोलते हैं…
धर्म:
पहले लोग
सुबह उठकर
मेरा नाम लेते थे
अब उठते ही
तुम्हारा पासवर्ड डालते हैं…
मोबाइल:
क्या करूँ?
मैं हमेशा साथ रहता हूँ
आप तो
कभी-कभी ही याद आते हैं…
धर्म (थोड़ा उदास):
पहले लोग
मेरे लिए उपवास रखते थे
मन को साफ़ करते थे
अब
तुम्हारे लिए
नेट पैक रिचार्ज करते हैं…
मोबाइल (मुस्कुराकर):
लेकिन देखिए
मैंने आपको खत्म नहीं किया
मैंने आपको
HD में ला दिया
4K में दिखा दिया
लाइव कर दिया…
धर्म:
हाँ…
तस्वीर साफ़ हो गई है
लेकिन नीयत
थोड़ी धुंधली हो गई है…
मोबाइल:
अब लोग
आपको सुनते हैं
वीडियो में
रील्स में
शॉर्ट्स में
कम समय में
ज़्यादा ज्ञान…
धर्म:
ज्ञान छोटा नहीं होता
समझ छोटी हो जाती है…
मोबाइल (थोड़ा चुप):
लोग अब
आपके लिए लड़ते भी हैं
मेरे प्लेटफॉर्म पर
कमेंट्स में
गालियाँ देते हैं
आपके नाम पर…
धर्म (गहरी सांस लेकर):
पहले
लोग मुझे जीते थे
अब
लोग मुझे साबित करते हैं…
मोबाइल:
तो क्या करूँ मैं?
मैं तो सिर्फ
दिखाता हूँ
जो लोग देखना चाहते हैं…
धर्म:
और मैं
वो दिखाता हूँ
जो लोग देखना नहीं चाहते…
मोबाइल:
तो फिर
हम दोनों में फर्क क्या है?
धर्म:
तुम
बाहर की दुनिया हो
मैं
अंदर की…
तुम
ध्यान भटकाते हो
मैं
ध्यान लगाता हूँ…
मोबाइल (धीरे से):
क्या हम
साथ नहीं रह सकते?
धर्म (मुस्कुराकर):
रह सकते हैं…
अगर तुम
शोर कम कर दो
और मैं
अहंकार…
धर्म और मोबाइल
दोनों साथ हों
तो इंसान
जुड़ा हुआ भी रहेगा
और जगा हुआ भी…
मुकेश ,,,,,,,,
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