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Saturday, 25 April 2026

सुबह की थकी हुई रौशनी

सुबह की थकी हुई रौशनी

मुकेश…

सुबह अब धीरे-धीरे अपनी उँगलियाँ फैलाने लगी है, मगर रौशनी में भी एक अजीब-सी थकान घुली हुई है—जैसे उजाला भी किसी बोझ तले दबा हो। खिड़की से आती हल्की-सी धूप, कमरे में बिखरकर भी सुकून नहीं देती, बल्कि हर कोने में छुपे ख़ामोश दर्द को और ज़्यादा उजागर कर देती है।

चाय का प्याला सामने रखा है, भाप भी उठ रही है—मगर उस भाप में भी कोई गर्माहट नहीं, बस धुंध-सी है… वैसी ही धुंध जैसी दिल के अंदर उतर आई है। एक घूंट होंठों तक आता है, मगर ज़ायका कहीं खो गया है—जैसे हर लज़्ज़त किसी याद की कड़वाहट में तब्दील हो चुकी हो।

ये जो सुबह है न…
ये अब नई शुरुआत का वादा नहीं करती,
बल्कि बीती रात के अधूरे किस्सों की गवाही देती है।

दिल के किसी कोने में एक हल्की-सी चुभन है—ना पूरी तरह दर्द, ना पूरी तरह सुकून… बस एक अधूरी सी कैफ़ियत, जो हर साँस के साथ थोड़ी और गहरी होती जाती है। ऐसा लगता है जैसे कोई बात, जो कभी कही नहीं गई, वो अब ख़ामोशी बनकर हर लम्हे में रिस रही हो।

और ये आँखें…
ये अब सिर्फ जागी नहीं हैं,
ये किसी इंतज़ार में हैं—
ऐसे इंतज़ार में जिसका कोई नाम नहीं,
कोई वक़्त नहीं,
कोई यक़ीन नहीं।

बस एक धुंधला-सा अहसास है,
कि कुछ था… जो अब नहीं है,
और कुछ है… जो कभी पूरी तरह होगा भी नहीं।

सुबह की रौशनी अब दीवारों से उतरकर दिल तक आ रही है,
मगर अजीब बात ये है—
कि जितनी रौशनी बढ़ती है,
अंदर का अंधेरा उतना ही साफ़ नज़र आने लगता है…

शेर:

सुबह की धूप में भी रात का साया-सा रहा,
दिल ने जो खोया था, वो ख़्वाब फिर पाया न रहा।

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