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Friday, 3 April 2026

डायरी: ईश्वर से बिना मिले जीना -जहाँ अंत में वो भीतर मिल जाता है

 डायरी: ईश्वर से बिना मिले जीना -जहाँ अंत में वो भीतर मिल जाता है


दिन 1

आज फिर मंदिर गया।

घंटी बजी, धूप जली, लोग झुके


मैं भी झुका…

पर भीतर

कुछ नहीं झुका।


दिन 9

लोग कहते हैं—

“ईश्वर हर जगह है।”


मैंने हर जगह देखा…

बस अपने भीतर

नहीं दिखा।


दिन 18

मैंने प्रार्थना की

शब्दों में, मंत्रों में,

किताबों में लिखी हुई भाषा में…


लेकिन

मेरी चुप्पी

किसी तक नहीं पहुँची।


दिन 30

आज लगा

शायद ईश्वर

मिलने की चीज़ नहीं,

मान लेने की आदत है।


और मैं…

अब तक मान नहीं पाया।


दिन 45

भीड़ में खड़े लोग

रो रहे थे, माँग रहे थे,

कुछ पा भी रहे थे शायद…


मैं खड़ा था

खाली हाथ

और खाली मन के साथ।


दिन 60

कभी-कभी सोचता हूँ

अगर ईश्वर है,

तो वो मुझसे क्यों नहीं मिलता?


या

मैं ही उससे मिलने लायक नहीं हूँ?


दिन 75

मैंने आज

ईश्वर को ढूँढना बंद कर दिया।


थक गया हूँ

हर दरवाज़े पर

खुद को झुकाते-झुकाते।


दिन 90

अब मैं

बिना मिले ही

जीना सीख रहा हूँ।


जैसे

कोई ख़त

जो कभी पहुँचा ही नहीं,

फिर भी

लिखा गया था…


दिन 110

आज

पहली बार

मैंने खुद के साथ

थोड़ा समय बिताया।


कोई मंत्र नहीं,

कोई मूर्ति नहीं—

सिर्फ

मेरी साँसें…


दिन 120

आँखें बंद कीं

तो शोर कम हुआ…


और उस खामोशी में

कुछ था—

बहुत हल्का,

बहुत सच्चा…


दिन 135

अब समझ में आ रहा है—

मैं बाहर

जिसे ढूँढ रहा था,


वो

अंदर

चुपचाप बैठा था…


दिन 150 — अंतिम पन्ना

आज

मैं फिर मंदिर गया…


लेकिन इस बार

कुछ माँगने नहीं,

कुछ पाने नहीं


बस

धन्यवाद कहने।


क्योंकि

जिससे मिलने निकला था,

वो

मुझमें ही था…


ईश्वर


मंदिरों में नहीं छिपा था

न शब्दों में

न भीड़ में


वो

मेरी ही खामोशी में

मेरा इंतज़ार कर रहा था…


ईश्वर से बिना मिले जीना


शायद

मिलना बाहर नहीं होता—


एक दिन

अचानक

तुम खुद से मिलते हो…


और समझ जाते हो


ईश्वर

कहीं गया ही नहीं था।


मुकेश ,,,,,,,,

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