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Saturday, 11 April 2026

तुम्हारी सांवली सूरत में

 सांवली सूरत, सौम्य शख़्सियत


तुम्हारी सांवली सूरत में

जैसे शाम-ए-ख़ामोश उतर आई हो,

न धूप की तीखी हरारत,

न शब की तन्हाई

बस एक ठहरी हुई रौशनी का नूर।


तुम गोरी सुबह नहीं,

तुम वो नर्म धूप हो

जो दिल पर आहिस्ता से उतरती है,

और रूह को सकून बख़्श देती है।


तुम्हारे चेहरे पर कोई शोर नहीं,

बस एक ख़ामोश चमक है

जैसे माहताब बादलों में छिपकर भी

अपनी मौजूदगी का एहसास कराए।


तुम्हारी शख़्सियत में

कोई नुमाइश नहीं,

वो तो बस रवाँ है—

जैसे दरिया बेज़ुबाँ होकर भी

प्यास बुझा जाए।


तुम्हारी मुस्कुराहट में

कोई इल्तिज़ा नहीं,

बस एक नर्म सा दावत है

कि आओ, ठहरो ज़रा,

और ख़ुद को भूल जाओ।


जब तुम सामने होते हो,

तो अल्फ़ाज़ कम पड़ जाते हैं,

और ख़ामोशी गुफ़्तगू करने लगती है

जैसे कोई दुआ

बिना लफ़्ज़ों के क़ुबूल हो जाए।


तुम्हारी सांवली सूरत में

एक गहराई है

जिसमें उतरकर

इंसान ख़ुद से वाबस्ता हो जाए।


तुम हुस्न नहीं,

एक एहसास हो

जो आँखों से नहीं,

रूह से महसूस किया जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,


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