अव्याकृत-उपासना का फल — “असंभवाद् अन्यत्…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
तथा च अन्यत् आहुः असंभवात् — असंभूतेः, अन्यात् व्याकृतात्, अव्याकृत-उपासनात्।
यत् उक्तम्— “अन्धं तमः प्रविशन्ति” इति; “प्रकृतिलयः” इति च पौराणिकेषु उच्यते॥१३॥
ईशावास्योपनिषद् के त्रयोदश मन्त्र पर आदि शंकराचार्य का यह भाष्यांश “असंभव” अथवा “असंभूति” की उपासना के फल को स्पष्ट करता है। जहाँ “संभव” (कार्य-ब्रह्म) की उपासना से अणिमा आदि ऐश्वर्य की प्राप्ति बताई गई, वहीं यहाँ यह प्रतिपादित किया जा रहा है कि “असंभव”— अर्थात् अव्याकृत, प्रकृति— की उपासना का फल उससे सर्वथा भिन्न है।
“असंभवात्” — अव्याकृत का निर्देश
शंकराचार्य “असंभव” का अर्थ करते हैं—
असंभूति — जो उत्पन्न नहीं हुआ
अव्याकृत — अप्रकट अवस्था
प्रकृति — मूल कारण
यह वह स्थिति है—
जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है
परन्तु जो स्वयं जड़ और अचेतन है
“अन्यत् आहुः” — फल की भिन्नता
यहाँ “अन्यत्” शब्द पुनः यह स्पष्ट करता है—
असम्भूति की उपासना का फल
सम्भूति (कार्य-ब्रह्म) की उपासना से सर्वथा भिन्न है
यह भिन्नता केवल मात्रा में नहीं,
बल्कि स्वरूप में है।
“अव्याकृतोपासनात्” — जड़ कारण की उपासना
जो साधक—
अव्याकृत (प्रकृति) को ही अंतिम सत्य मानकर
उसकी उपासना करते हैं
वे—
जड़ कारण में ही आसक्त रहते हैं
यह उपासना—
चेतना का उत्कर्ष नहीं करती
बल्कि उसे मूल कारण में विलीन कर देती है
“अन्धं तमः प्रविशन्ति” — उपनिषद् का प्रतिपादन
शंकराचार्य यहाँ पूर्व मन्त्र (१२) का स्मरण कराते हैं—
“अन्धं तमः प्रविशन्ति”
अर्थात्—
ऐसे साधक गहन अज्ञान में प्रवेश करते हैं
यह अज्ञान—
बाह्य अन्धकार नहीं
बल्कि आत्म-दर्शन का अभाव है
“प्रकृतिलयः” — पौराणिक परिभाषा
इस भाष्य का एक अत्यन्त रोचक और महत्वपूर्ण पक्ष है—
“प्रकृतिलय”
शंकराचार्य कहते हैं कि—
पौराणिक ग्रन्थों में इस अवस्था को “प्रकृतिलय” कहा गया है।
अर्थात्—
साधक प्रकृति में ही लीन हो जाता है
वह अपने कारण में विलय को प्राप्त होता है
किन्तु—
यह मोक्ष नहीं है
क्योंकि—
इसमें आत्मज्ञान का उदय नहीं होता
केवल कारण में लय होता है
प्रकृतिलय की सीमाएँ
“प्रकृतिलय” देखने में उच्च अवस्था प्रतीत हो सकती है,
परन्तु वास्तव में—
यह जड़ में विलय है
चेतना का उत्कर्ष नहीं
अतः—
यह एक प्रकार का स्थगन (suspension) है,
न कि मुक्ति (liberation)
दार्शनिक गहराई
यह भाष्यांश एक अत्यन्त सूक्ष्म भेद को स्पष्ट करता है—
कार्य में लय (हिरण्यगर्भ) → चेतन, सूक्ष्म अवस्था
कारण में लय (प्रकृति) → जड़, अज्ञानात्मक अवस्था
दोनों ही—
अंतिम सत्य नहीं हैं
दृष्टांत
जैसे—
कोई नदी समुद्र में मिल जाए (चेतन विस्तार),
और कोई जलकण मिट्टी में समा जाए (जड़ लय)—
दोनों में लय है,
परन्तु दोनों की प्रकृति भिन्न है।
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “असंभव” (अव्याकृत, प्रकृति) की उपासना का फल “प्रकृतिलय” है— जहाँ साधक जड़ कारण में ही विलीन हो जाता है।
यह अवस्था—
“अन्धं तमः” — आत्मदर्शन के अभाव का द्योतक है
अतः—
अव्याकृत में लय मोक्ष नहीं,
बल्कि अज्ञान की एक सूक्ष्म अवस्था है।
यही इस पद का गूढ़ और दार्शनिक संदेश है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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