याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात्” — सर्वज्ञ ईश्वर द्वारा जगत्-व्यवस्था का नियमन (अष्टम मन्त्र का शांकरार्थ)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
ईश्वरः याथातथ्यतः सर्वज्ञत्वात् यथातथाभावः याथातथ्यम्।
तस्मात् यथाभूतम् एव अर्थान् कर्तव्य-पदार्थान् व्यदधात्,
विहितवान्, यथारूपम् विभजत् इति।
ईश्वर, जो सर्वज्ञ है, वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में जानता है—इसी को “याथातथ्य” कहते हैं।
अतः उसने वस्तुओं को उनके यथार्थ स्वरूप के अनुसार ही व्यवस्थित किया, उनके कर्तव्यों को निर्धारित किया और उन्हें उचित प्रकार से विभाजित किया।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के अष्टम मन्त्र के अंतिम भाग का गूढ़ अर्थ प्रस्तुत करता है, जहाँ ब्रह्म (ईश्वर) के सर्वज्ञता और जगत्-व्यवस्था के नियामक स्वरूप का निरूपण किया गया है।
प्रथम वाक्य—“ईश्वरः याथातथ्यतः सर्वज्ञत्वात्”—
यहाँ शंकराचार्य बताते हैं कि ईश्वर “याथातथ्यतः” जानता है।
“याथातथ्य” का अर्थ है—जैसा वस्तु वास्तव में है, वैसा ही जानना।
सामान्य जीव की ज्ञान-शक्ति सीमित और भ्रमित होती है
वह वस्तुओं को आंशिक या विकृत रूप में जानता है।
परंतु ईश्वर का ज्ञान पूर्ण, त्रुटिरहित और प्रत्यक्ष है
वह प्रत्येक वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में जानता है।
इसी को कहा गया—“यथातथाभावः याथातथ्यम्”
अर्थात् वस्तु का जैसा-का-तैसा स्वरूप।
अब इसके आधार पर अगला निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है
“तस्मात्…”
अर्थात् इस सर्वज्ञता के कारण ही
“यथाभूतम् एव अर्थान्… व्यदधात्”
ईश्वर ने समस्त पदार्थों और कर्तव्यों को उनके वास्तविक स्वरूप के अनुसार ही व्यवस्थित किया।
यहाँ “अर्थान्” का अर्थ है
जगत् के समस्त तत्त्व
और “कर्तव्य-पदार्थ” — वे कर्म और भूमिकाएँ जो प्रत्येक जीव के लिए निर्धारित हैं
“व्यदधात्” का अर्थ है—विभाजित किया, व्यवस्थित किया, नियत किया।
अर्थात्, ईश्वर ने जगत् में जो विविधता और व्यवस्था है
जैसे विभिन्न जीवों के स्वभाव, कर्म, फल, प्रकृति
उन्हें किसी संयोग से नहीं, बल्कि पूर्ण ज्ञान और न्याय के आधार पर निर्धारित किया है।
“विहितवान्, यथारूपम् विभजत्”
उसने सबको उनके स्वभाव और योग्यता के अनुसार ही विभाजित किया।
यहाँ शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि
जगत् में जो भी व्यवस्था है, वह अज्ञान या अराजकता का परिणाम नहीं, बल्कि सर्वज्ञ ईश्वर की सुव्यवस्थित योजना है।
यह अद्वैत वेदान्त में ईश्वर की भूमिका को स्पष्ट करता है
परम दृष्टि से ब्रह्म निरुपाधिक, निष्क्रिय है
परंतु उपाधि (माया) के साथ वही ब्रह्म ईश्वर बनकर जगत् का नियमन करता है
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे एक कुशल वास्तुकार भवन के प्रत्येक भाग को उसकी उपयोगिता और संरचना के अनुसार व्यवस्थित करता है,
वैसे ही ईश्वर जगत् के प्रत्येक तत्त्व को उसके स्वभाव और कर्म के अनुसार व्यवस्थित करता है।
इस प्रकार, “याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात्” पद ब्रह्म की सर्वज्ञता, न्यायपूर्ण व्यवस्था और नियामक शक्ति को प्रकट करता है।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि ईश्वर, अपनी सर्वज्ञता के कारण, समस्त जगत् को उसके यथार्थ स्वरूप के अनुसार व्यवस्थित करता है। “याथातथ्य” का अर्थ है वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में जानना, और उसी के आधार पर उनका विभाजन और नियमन करना। इस प्रकार, जगत् की समस्त व्यवस्था ईश्वर की पूर्ण ज्ञान और न्याय पर आधारित है—यही अद्वैत वेदान्त की दार्शनिक दृष्टि है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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