आत्महनन और अविद्या का बंधन — शंकरभाष्यपरक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
यस्य आत्मनः हननात् अविद्वान् सः संस्रति तद्विषयेण।
विद्वांसः जना न उच्यन्ते आत्महननः। तत् किम्? आत्मतत्त्वविमर्शनम् इति उच्यते।
जो मनुष्य अपने आत्मा का हनन करता है, अर्थात् आत्मा के सत्य स्वरूप को न जानकर अज्ञान में रहता है, वह विषयों के कारण संसार में भटकता रहता है।
परंतु जो ज्ञानी पुरुष हैं, वे आत्मा का हनन करने वाले नहीं कहलाते।
तो आत्मा का हनन क्या है? — आत्मतत्त्व का विवेक (सत्य ज्ञान) न करना ही आत्महनन कहा जाता है।
व्याख्या (गद्य निबंध शैली में)
यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के एक अत्यंत सूक्ष्म और गहन सिद्धांत को उद्घाटित करता है—आत्मा का "हनन" वास्तव में क्या है? शंकराचार्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि आत्मा नित्य, अविनाशी और सर्वव्यापी है; अतः उसका वास्तविक हनन (नाश) कभी संभव नहीं। फिर भी "आत्महनन" शब्द का प्रयोग शास्त्रों में क्यों किया गया है?
इसका उत्तर है—अविद्या (अज्ञान)।
जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप, अर्थात् आत्मा को नहीं जानता, और स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि आदि से अभिन्न मान लेता है, तब वह अपने आत्मस्वरूप की उपेक्षा करता है। यही उपेक्षा, यही अज्ञान, शंकराचार्य के अनुसार आत्महनन है। यह कोई भौतिक हत्या नहीं, बल्कि स्वरूप-विस्मृति है।
अविद्वान पुरुष विषयों (इन्द्रिय सुखों) में आसक्त होकर कर्म करता है। यह कर्म उसे पुनः-पुनः जन्म-मरण के चक्र में डालता है—इसी को "संसरण" कहा गया है। यहाँ "तद्विषयेण" का आशय है कि विषय-भोग की प्रवृत्ति ही संसार-बन्धन का कारण बनती है। जैसे कोई व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को निर्धन या पीड़ित समझकर दुःखी होता है, वैसे ही अज्ञानी जीव अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूलकर संसार में दुखी होता रहता है।
इसके विपरीत, विद्वान—जो आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर चुका है—वह आत्मा को शरीर से भिन्न, शुद्ध चैतन्य स्वरूप जानता है। वह न तो कर्ता है, न भोक्ता; अतः वह कर्मबंधनों से मुक्त रहता है। इसीलिए उसे "आत्महनन" का दोष नहीं लगता। वह जानता है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है—वह केवल साक्षी है।
शंकराचार्य का यहाँ यह भी अभिप्राय है कि आत्मतत्त्व का विमर्श (गंभीर चिंतन और आत्मानुभूति) ही मोक्ष का मार्ग है। केवल शास्त्रज्ञान पर्याप्त नहीं; जब तक व्यक्ति अपने भीतर आत्मा के स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करता, तब तक अविद्या बनी रहती है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
यदि कोई व्यक्ति अंधेरे में रस्सी को साँप समझ ले, तो वह भयभीत हो जाता है। यह भय वास्तविक नहीं, बल्कि अज्ञानजन्य है। जैसे ही प्रकाश होता है, वह जान जाता है कि यह रस्सी है, साँप नहीं। उसी प्रकार, आत्मज्ञान रूपी प्रकाश से अज्ञान का नाश होता है, और संसार का भय समाप्त हो जाता है।
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