अदृश्य ग्रहों का संविधान
कहते हैं
हर देश का एक संविधान होता है
लिखा हुआ, छपा हुआ,
धूल और बहसों के बीच सुरक्षित।
पर मुझे अक्सर लगता है,
हमारे ऊपर
एक और संविधान लागू है
अदृश्य ग्रहों का,
जिसे किसी ने पढ़ा नहीं,
पर सब मानते हैं।
सुबह जब निर्णय लिए जाते हैं,
तो वे तर्क से कम,
किसी अनकही दिशा से ज़्यादा आते हैं
जैसे किसी ग्रह ने
धीरे से सिर हिला दिया हो।
नेताओं की आँखों में
कभी-कभी
मुझे नक्षत्रों की थकान दिखती है
वे बोलते हैं,
पर शब्द
उनके अपने नहीं लगते।
न्यायालयों में
फैसले सुनाए जाते हैं,
पर न्याय
किसी अदृश्य तुला पर
झूलता रहता है
जहाँ संतुलन
हमेशा थोड़ा-सा डगमगाता है।
मैंने किताबों में पढ़ा था
संविधान बराबरी देता है,
स्वतंत्रता देता है,
आवाज़ देता है।
पर सड़कों पर चलते हुए
अक्सर लगता है
यह सब
किसी दूसरे लोक के वादे हैं।
यहाँ
हर व्यक्ति
किसी न किसी अदृश्य नियम से बँधा है
कोई अपने नाम से,
कोई अपने धर्म से,
कोई अपने डर से।
और इन सबके ऊपर
एक मौन अनुच्छेद है—
जिसे कोई नहीं पढ़ता,
पर वही सबसे प्रभावशाली है।
रात को
जब शहर सो जाता है,
मैं आकाश की तरफ देखता हूँ
तारे स्थिर लगते हैं,
पर भीतर ही भीतर
वे भी किसी नियम में बँधे हैं।
तब समझ में आता है
संविधान केवल कागज़ पर नहीं,
हमारे भीतर भी लिखा जाता है।
और शायद
सबसे कठिन काम यह नहीं
कि हम उसे बदलें,
बल्कि यह है
कि हम पहचानें
कौन-सा नियम
वास्तव में हमारा है,
और कौन-सा
सिर्फ डर और परंपरा का
अदृश्य ग्रह।
क्योंकि जिस दिन
हम यह भेद समझ लेंगे,
शायद उसी दिन
हमारा देश
पहली बार
सचमुच स्वतंत्र होगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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