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Wednesday, 8 April 2026

तुम्हारी मौजूदगी जो दूर होकर भी साथ रहती है

 तुम्हारी मौजूदगी 

जो दूर होकर भी साथ रहती है


तुम्हारी मौजूदगी लिख दूँ

तुम्हारे कहने से…

मगर मौजूदगी लिखते ही

फ़ासले मायने खो देते हैं,

जैसे दूरी भी

तुम्हारा नाम सुनकर

पास आ जाती हो।


क्योंकि तुम्हारी मौजूदगी

सिर्फ़ पास होने का एहसास नहीं,

ये वो साया है

जो दूर रहकर भी साथ चलता है।


तुम्हारी मौजूदगी

कभी हवा की तरह महसूस होती है

दिखती नहीं,

पर हर पल छू जाती है।

कभी किसी दुआ की तरह,

जो होंठों से नहीं,

दिल से निकलती है।


जब तुम दूर होती हो,

तब भी

तुम्हारी मौजूदगी

मेरे आसपास ठहरी रहती है

जैसे वक़्त ने

तुम्हें जाने से रोका हो।


तुम्हारे लिए

शायद ये बस एक रिश्ता हो,

कुछ यादों का सिलसिला

जो धीरे-धीरे हल्का पड़ जाता है।

पर मेरे लिए

तुम्हारी मौजूदगी

वो यक़ीन है

जो हर खालीपन को

भर देता है।


इस मौजूदगी में

कभी सुकून है,

कभी तड़प,

कभी वो अपनापन

जो दूरी में और गहरा हो जाता है।


तुम्हारी मौजूदगी में

एक अजीब-सी रौशनी है

जो दिखे ना दिखे,

पर हर अँधेरे को

कम कर देती है।


मैं तुम्हारी मौजूदगी को लिखने चला था,

उसे लफ़्ज़ों में समेटने के लिए…

पर जो मिला

वो एक एहसास था,

जो किसी जगह में नहीं,

बस दिल में बसता है।


तुम्हारी मौजूदगी ने सिखाया

कि साथ रहने के लिए

पास होना ज़रूरी नहीं,

कुछ रिश्ते

रूह से जुड़े होते हैं।


और सच यही है

अगर किसी ने मोहब्बत को समझना है,

तो मिलने की नहीं,

महसूस होने की अहमियत समझनी होगी।


मुकेश ,,,,,

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