अन्तकालोपासना और “सत्य–आदित्य–अक्षिपुरुष” की एकता — निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
तद्यत् तत् सत्यम्— असौ स आदित्यः;
यः एषः एतस्मिन् मण्डले पुरुषः,
यः च अयं दक्षिणे अक्ष्णि पुरुषः।
एतत् उभयं सन् ब्रह्मोपासीनः,
यथोक्तं कर्म च (कृत्वा) यः सः अन्तकाले प्राप्ते सत्यात्मानम्…
भूमिका
यह पदांश उपनिषद् की उस गूढ़ शिक्षा का उद्घाटन करता है, जहाँ बाह्य ब्रह्माण्ड (आदित्य) और आन्तरिक चेतना (अक्षिपुरुष) के मध्य अद्भुत साम्य स्थापित किया गया है। आदि शंकराचार्य के भाष्य में यह स्पष्ट होता है कि साधक, यदि इन दोनों को एक ही सत्य के रूप में देखता है, तो वह अंततः “सत्यात्मा” की प्राप्ति करता है।
“तद्यत् तत् सत्यम्…” — परम सत्य का संकेत
“तत् सत्यम्” का अर्थ है—
वह जो नित्य है
जो कभी बदलता नहीं
जो समस्त अनुभवों का आधार है
उपनिषद् यहाँ उस सत्य को दो रूपों में प्रस्तुत करता है—
“असौ स आदित्यः” — बाह्य प्रकाश
“वह आदित्य (सूर्य)”
प्रकाश का स्रोत
जीवन का आधार
दृश्य जगत् का केन्द्र
यह—
बाह्य ब्रह्माण्ड में सत्य का प्रतीक है
“एतस्मिन् मण्डले पुरुषः” — सूर्य-मण्डल का पुरुष
यहाँ संकेत है—
सूर्य के भीतर स्थित चेतन सत्ता
यह केवल भौतिक सूर्य नहीं,
बल्कि—
उसका अधिष्ठाता पुरुष
“दक्षिणे अक्ष्णि पुरुषः” — आन्तरिक चेतना
अब उपनिषद् भीतर की ओर मुड़ता है—
“दक्षिण नेत्र में स्थित पुरुष”
यह क्या है?
देखने वाला
साक्षी
चेतना का केन्द्र
अतः—
जो बाहर सूर्य में है,
वही भीतर नेत्र में है
“एतदुभयं सन्…” — एकत्व का बोध
यहाँ साधक के लिए शिक्षा है—
इन दोनों को अलग न देखो
बाह्य (आदित्य)
आन्तरिक (अक्षिपुरुष)
दोनों एक ही ब्रह्म के रूप हैं
“ब्रह्मोपासीनः” — ध्यान की प्रक्रिया
जो साधक—
इस एकत्व का ध्यान करता है
बाह्य और आन्तरिक में भेद नहीं मानता
वही “ब्रह्मोपासक” है
“यथोक्तं कर्म च…” — पूर्व साधना का महत्व
यहाँ यह भी कहा गया है—
केवल ध्यान ही नहीं,
बल्कि शास्त्रानुसार कर्म भी आवश्यक है
अर्थात्—
कर्म → चित्तशुद्धि
उपासना → एकाग्रता
ज्ञान → अंतिम बोध
“अन्तकाले…” — मृत्यु का निर्णायक क्षण
अब सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु—
अन्तकाल (मृत्यु का क्षण)
उस समय—
साधक का चित्त जिस भाव में होता है
वही उसकी गति निर्धारित करता है
“सत्यात्मानम्…” — अंतिम उपलब्धि
यदि साधक—
इस एकत्व को जानकर
उसी में स्थित होकर
देह त्याग करता है—
वह “सत्यात्मा” को प्राप्त करता है
अर्थात्—
ब्रह्मभाव
अद्वैत स्थिति
अमृतत्व
दार्शनिक गहराई
यह पदांश एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त स्थापित करता है—
बाह्य और आन्तरिक में कोई वास्तविक भेद नहीं
जो सूर्य में है
वही आत्मा में है
दृष्टांत
जैसे—
एक ही आकाश
घड़े के भीतर भी है और बाहर भी—
उसी प्रकार—
एक ही चेतना
ब्रह्माण्ड में भी है और जीव में भी
इस उपनिषद्-वाक्य का सार यह है—
जो साधक
कर्म और उपासना से शुद्ध होकर
आदित्य और अक्षिपुरुष की एकता को जानता है
वह अंतकाल में
सत्यात्मा को प्राप्त करता है
आदि शंकराचार्य के अनुसार—
यही उपासना साधक को धीरे-धीरे उस बोध तक ले जाती है,
जहाँ बाह्य सूर्य और आन्तरिक आत्मा — दोनों एक ही ब्रह्म के रूप में प्रकट होते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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