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Sunday, 12 April 2026

तुम्हारा हुस्न — एक रूहानी तजुर्बा

तुम्हारा हुस्न — एक रूहानी तजुर्बा

तुम्हारी सूरत में

कोई साज़िश नहीं हुस्न की,

न कोई बनावट,

न कोई दिखावा

बस एक सादगी है

जो दिल तक बिना दस्तक पहुँच जाती है।


तुम्हारा चेहरा

किसी आईने का मोहताज नहीं,

क्योंकि जो नूर तुममें है,

वो बाहर से नहीं आता

वो तुम्हारी रूह से उठता है।


तुम्हारी आँखें…

सिर्फ़ देखने का ज़रिया नहीं,

बल्कि एक खामोश गुफ़्तगू हैं

जहाँ अल्फ़ाज़ खो जाते हैं

और एहसास बोलने लगते हैं।


तुम्हारी मुस्कुराहट में

कोई बनावटी चमक नहीं,

वो तो जैसे दिल की तह से उठी

एक सच्ची दुआ हो

जो बिना माँगे भी

कबूल हो जाए।


तुम्हारा वजूद

सिर्फ़ जिस्म का हिस्सा नहीं,

वो एक पूरा एहसास है

जो छूने से नहीं,

महसूस करने से समझ आता है।


मैं तुम्हें देखता हूँ

तो सिर्फ़ तुम्हारा हुस्न नहीं दिखता,

बल्कि वो सुकून दिखता है

जो किसी दरिया के किनारे

ख़ामोशी में बैठकर मिलता है।


तुम्हारी ख़ामोशी भी

कुछ कहती है

जैसे कोई ग़ज़ल

बिना लफ़्ज़ों के गाई जा रही हो।


तुम्हारे पास आकर

ऐसा लगता है,

जैसे दुनिया की सारी आवाज़ें

धीमी पड़ गई हों

और सिर्फ़ दिल की धड़कन

अपनी असली ज़ुबान में बोल रही हो।


तुम हुस्न नहीं,

एक एहसास हो

एक ऐसा एहसास

जो वक़्त के साथ नहीं मिटता,

बल्कि हर गुज़रते लम्हे में

और गहरा होता जाता है।


और शायद…

इसीलिए तुम ख़ूबसूरत हो

क्योंकि तुम्हें देखने के लिए

आँखों से ज़्यादा

रूह की ज़रूरत पड़ती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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