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Sunday, 12 April 2026

इलाज-ए-मोहब्बत

 इलाज-ए-मोहब्बत


इलाज अपना कराते फिर रहे हो

जाने किस-किस हकीम से,

हर दर्द को नाम देते हो,

हर ज़ख़्म का सबब ढूँढते हो।


मगर कभी ये भी सोचा है—

ये जो बेचैनी है सीने में,

ये जो रूह में हलचल है,

शायद ये कोई बीमारी नहीं…

कोई पुकार है।


तुम दवाओं में ढूँढते हो सुकून,

और सुकून तुमसे कहता है—

मुझे महसूस करो,

मैं किसी नुस्ख़े में नहीं मिलता।


मोहब्बत से डरते हो तुम,

जैसे ये कोई आफ़त हो,

जैसे दिल का खुल जाना

सबसे बड़ा ख़तरा हो।


मगर सुनो—

ये जो तुम हर दर पे भटकते हो,

ये जो हर चेहरे में मरहम तलाशते हो,

ये सब उसी एक चीज़ की कमी है

जिसे तुम टालते रहते हो।


मोहब्बत कोई मर्ज़ नहीं,

मगर हर मर्ज़ की दवा है—

बस एक बार दिल को

ख़ुद से आज़ाद करके देखो।


इलाज अपने आप हो जाएगा,

जब तुम हिसाब छोड़ दोगे—

जब देना सीखोगे

बिना किसी शर्त के।


तो आओ…

आज किसी हकीम के पास नहीं,

अपने दिल के पास चलो—

और एक बार,

सिर्फ़ एक बार…


मोहब्बत कर के देखो।


aur roomanee see

इलाज-ए-मोहब्बत (रूमानी रंग में)


इलाज अपना कराते फिर रहे हो

जाने किस-किस हकीम से,

मगर ये दिल की नर्मी, ये हल्की-सी टीस—

किस दवा से जाएगी, सोचा है कभी?


ये जो रातों में तन्हा-सा ख़याल आता है,

जो किसी नाम पे ठहर जाता है,

ये कोई मर्ज़ नहीं जान-ए-जाँ…

ये तो मोहब्बत की पहली आहट है।


तुम हर दर्द को दबाते हो,

हर जज़्बात से बचते हो,

जैसे दिल को महफ़ूज़ रख लोगे—

मगर दिल तो उसी में धड़कता है

जहाँ ख़तरा होता है।


कभी मेरे पास बैठो,

बिना किसी सवाल के,

मैं तुम्हें सिखाऊँ

कैसे एक नज़र भी

इबादत बन जाती है।


तुम्हारे लबों पे जो हिचक है,

वो भी इक हुस्न है,

और तुम्हारी ख़ामोशी में

जो अनकहा है—

वही तो मेरा जहाँ है।


इलाज ढूँढते हो तुम,

और मैं तुम्हें बस ये कहती हूँ—

दवा कोई बाहर नहीं,

तुम्हारे अपने दिल में है।


एक बार…

मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुरा दो,

और फिर देखना—

ये सारी दुनिया कितनी नर्म हो जाएगी।


इलाज अपना खुद हो जाएगा,

जब तुम ये मान लोगे—

कि कुछ दर्द

सिर्फ़ मोहब्बत से ही भरते हैं।


तो छोड़ो ये हकीमों के दर,

आओ मेरे पास…

और एक बार—

मोहब्बत कर के देखो।


मुकेश ,,,,,,,

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