होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 20 April 2026

पूषन्नेकर्षे…” पद का शांकरभाष्य — सम्बोधन-पदों का निबंधात्मक विवेचन

 “पूषन्नेकर्षे…” पद का शांकरभाष्य — सम्बोधन-पदों का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

[पूषन्निति] — पूषन्, हे पूषन्! जगतः पोषणात् पूषा रविः।

तथा — एक एव ऋषति (गच्छति) इति एकर्षिः।

हे एकर्षे! तथा— सर्वस्य नियन्ता…॥१६॥

ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र का आरम्भ “पूषन् एकर्षे…” इन सम्बोधन-पदों से होता है। आदि शंकराचार्य इन पदों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यहाँ साधक केवल सूर्य को संबोधित नहीं कर रहा, बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड के पोषक, नियन्ता और साक्षी चैतन्य को पुकार रहा है।

ये सम्बोधन मात्र काव्यात्मक अलंकार नहीं, बल्कि साधक की अन्तःस्थिति और उसके ज्ञान-उद्गार के प्रतीक हैं।

“पूषन्” — जगत् का पोषक

“पूषन्” शब्द की व्युत्पत्ति है—

पोषणात् पूषा

अर्थात्—

जो सम्पूर्ण जगत् का पोषण करता है

शंकराचार्य के अनुसार—

सूर्य समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है

वह अन्न, ऊर्जा और जीवन का स्रोत है

अतः—

“पूषन्” यहाँ जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है


किन्तु गूढ़ अर्थ में

यह ब्रह्म की पोषण-शक्ति का संकेत है

“एकर्षे” — एकमात्र गमनशील, सर्वपथ-प्रदर्शक

“एकर्षि” शब्द का अर्थ है—

“एक एव ऋषति (गच्छति)”

अर्थात्—

जो अकेला चलता है


यहाँ संकेत है

सूर्य आकाश में एकमात्र गति करता हुआ प्रतीत होता है

वह सबका मार्गदर्शक है


दार्शनिक अर्थ में

यह उस चेतना का बोध है

जो—


स्वयंप्रकाश है

और सबको मार्ग दिखाती है

“हे एकमे” — अद्वैत का संकेत

यह सम्बोधन साधक के अद्वैत-बोध को प्रकट करता है—

“एकमे” — तू एक ही है

अर्थात्—

कोई द्वैत नहीं

कोई दूसरा नहीं

यहाँ साधक—

देवता में एकत्व का अनुभव करने लगा है

“सर्वस्य…” — नियन्ता और अधिष्ठाता

शंकराचार्य आगे संकेत करते हैं—

यह पूषन्

केवल पोषक ही नहीं

बल्कि सर्वस्य नियन्ता भी है

अर्थात्—

समस्त जगत् का संचालन उसी से है

वही नियमों का आधार है

यह—

ब्रह्म की ईश्वर-रूप अभिव्यक्ति है

सम्बोधन-पदों का आन्तरिक अर्थ

इन सभी सम्बोधनों को यदि एक साथ देखें—

पूषन् → पोषण करने वाला

एकर्षे → मार्गदर्शक

एकमे → अद्वितीय

सर्वस्य → नियन्ता


तो यह स्पष्ट होता है कि—

साधक बाह्य सूर्य में

ब्रह्म के समस्त गुणों का दर्शन कर रहा है

उपासना से ज्ञान की ओर संक्रमण

यहाँ एक महत्वपूर्ण बिन्दु है—

ये सम्बोधन उपासना के हैं,

परन्तु इनका लक्ष्य ज्ञान है

साधक—

पहले देवता को पुकारता है

फिर उसके स्वरूप को समझता है

और अंततः उसमें एकत्व का अनुभव करता है

दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश यह सिखाता है कि—

उपासना में प्रयुक्त नाम और रूप

वास्तव में ब्रह्म के संकेत हैं


यदि साधक—

उनके गूढ़ अर्थ को समझ ले,

तो वही उपासना—

ज्ञान में परिवर्तित हो जाती है


दृष्टांत

जैसे—

कोई बालक सूर्य को केवल प्रकाश मानता है,

परन्तु धीरे-धीरे वह समझता है कि वही जीवन का आधार है—

उसी प्रकार—

साधक देवता के बाह्य रूप से

उसके आन्तरिक सत्य तक पहुँचता है

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “पूषन्”, “एकर्षे” आदि सम्बोधन केवल नाम नहीं, बल्कि ब्रह्म के विविध आयामों के द्योतक हैं।

अतः—

उपासना के ये शब्द साधक को बाह्य देवता से उठाकर

आन्तरिक अद्वैत सत्य की ओर ले जाते हैं।

यही इन सम्बोधनों का गूढ़ और दार्शनिक अर्थ है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment