एक कवि — जुदाई के बाद
सुनो…
तुमने अब
मेरे पैग़ामों के जवाब कम कर दिए हैं,
पहले “ठीक है”
फिर “ओके”…
और अब
कई-कई पैग़ाम
सिर्फ़ seen रह जाते हैं
बेज़बान, बेआवाज़।
लगता है
ये तुम्हारा ख़ामोश एहतिजाज है,
नाराज़गी का
एक नफ़ीस तरीक़ा।
हो सकता है
मेरी किसी बात ने
तुम्हारे दिल को नागवार गुज़री हो
जैसे उस रोज़
मैंने तुम्हारे रुख़्सार को छू लेने की ख़्वाहिश की थी,
या तुम्हें
बाँहों में भर लेने की गुज़ारिश…
और तुमने
हल्के से “ना” कह दिया था
और मैं…
बिना किसी इसरार के
एक शरीफ़ बच्चे की तरह
तुम्हारी मरज़ी को
अपनी मोहब्बत से ऊपर रखकर
वापस आ गया था।
हाँ,
उस रात
मैंने एक की जगह
दो सिगरेटें सुलगाई थीं,
और करवट बदलकर
नींद को मनाया था।
कई रोज़ तक
तुम्हारे व्हाट्सऐप की
ख़ाली स्क्रीन को
बेवजह देखता रहा,
मेसेंजर, फ़ेसबुक भी टटोला
मगर तुम
कहीं भी नज़र नहीं आईं
किसी नए अहसास के साथ।
तुमने तो
मेरी पोस्ट पर
तवज्जो देना भी
काफ़ी पहले छोड़ दिया था।
अब शायद
तुम किसी और की दास्तान में शामिल हो,
(हालाँकि मैं
तुम्हारी कहानी में था भी कब…)
या मुमकिन है
तुम्हारा एतबार ही उठ गया हो
इश्क़ से…
बाक़ी
“मसरूफ़ियत”, “रूहानियत”, “तबीयत”
ये सब बहाने लगते हैं,
कम-अज़-कम
तुम्हारे लिए तो…
ख़ैर…
मैं भी
चंद रोज़ में
फिर से मामूल पर आ जाऊँगा,
और अल्फ़ाज़
दोबारा
मेरे क़लम से रिश्ता जोड़ लेंगे।
तुम बस
ख़ुश रहो
जहाँ भी हो,
जिसके साथ भी हो…
क्योंकि
मेरी मोहब्बत का
आख़िरी शेर
यही है
तुम्हारी ख़ुशी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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