होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 18 April 2026

कारण-शरीर-निषेध और ब्रह्म की निष्कलंकता — अष्टम मन्त्र का शांकरार्थ

 

“कारण-शरीर-निषेध और ब्रह्म की निष्कलंकता — अष्टम मन्त्र का शांकरार्थ

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

विच्छिन्न-मल-रहितम् इति कारणशरीर-प्रतिषेधः।

अपापविद्धम् = धर्म-अधर्मादि-पाप-वर्जितम्।

“शुक्रम्” इत्यादीनि वचनानि पुल्लिङ्गत्वेन परिणमनीयानि,

“सः पर्यगात्… कविः मनीषी…” इत्यादिना पुल्लिङ्गोपसंहारात्।

मलरहित (अविद्या से रहित) होने के कारण ब्रह्म का कारण शरीर भी नकार दिया गया है।

“अपापविद्धम्” का अर्थ है—धर्म, अधर्म आदि से उत्पन्न पापों से रहित।

और “शुक्रम्” आदि शब्दों को पुल्लिंग में समझना चाहिए, क्योंकि आगे “सः पर्यगात्, कविः, मनीषी” आदि पुल्लिंग शब्दों से उपसंहार किया गया है।


यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के अष्टम मन्त्र में ब्रह्म के स्वरूप-निर्देश का और अधिक सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ शंकराचार्य तीन महत्वपूर्ण बातों का प्रतिपादन करते हैं—

(1) कारण-शरीर का निषेध,

(2) पाप से पूर्ण असंगता,

(3) व्याकरणिक रूप से ब्रह्म के लिङ्ग का संकेत।


प्रथम—“विच्छिन्न-मल-रहितम् इति कारणशरीर-प्रतिषेधः”।

यहाँ “मल” का अर्थ है—अविद्या, जो कारण-शरीर (कारणावस्था) का मूल है।

जीव के तीन शरीर माने जाते हैं—स्थूल, सूक्ष्म और कारण।

पहले “अव्रणम्, अस्नाविरम्” आदि से स्थूल शरीर का निषेध किया गया,

और “अशरीरम्” से सूक्ष्म शरीर का भी निषेध हो चुका।


अब यहाँ कहा जा रहा है कि ब्रह्म मलरहित है—अर्थात् उसमें अविद्या का लेश भी नहीं।

अतः कारण-शरीर का भी पूर्ण निषेध हो जाता है।


इस प्रकार, ब्रह्म तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) से सर्वथा रहित सिद्ध होता है—

यही उसकी निरुपाधिकता (absolute nature) है।


द्वितीय—“अपापविद्धम्”।

शंकराचार्य इसे स्पष्ट करते हैं—“धर्म-अधर्मादि-पाप-वर्जितम्”।

अर्थात् ब्रह्म न केवल पाप से, बल्कि धर्म-अधर्म (कर्मफल के समस्त बंधनों) से भी रहित है।


यहाँ “धर्म” भी बंधन का कारण माना गया है, क्योंकि वह भी कर्मफल उत्पन्न करता है।

इस प्रकार, ब्रह्म कर्म-संस्कारों से पूर्णतः परे है—

वह न कर्ता है, न भोक्ता।


यह अद्वैत का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है

जहाँ कर्म नहीं, वहाँ पाप-पुण्य नहीं; और जहाँ ये नहीं, वहाँ बंधन नहीं।


तृतीय—“शुक्रम्” इत्यादीनि वचांसि पुल्लिङ्गत्वेन परिणमनीयानि।

यह एक सूक्ष्म व्याकरणिक संकेत है।

यद्यपि “शुक्रम्”, “अव्रणम्”, “अस्नाविरम्” आदि शब्द नपुंसकलिङ्ग में हैं,

परंतु शंकराचार्य कहते हैं कि इन्हें पुल्लिंग के रूप में ग्रहण करना चाहिए।


क्यों?—

क्योंकि मन्त्र के प्रारम्भ में “सः पर्यगात्” और अंत में “कविः, मनीषी” आदि पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग हुआ है।

अतः सम्पूर्ण वर्णन एक ही तत्त्व—ब्रह्म—का है, जो यहाँ पुल्लिंग में उपसंहृत किया गया है।


यह केवल व्याकरण की बात नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि

विभिन्न विशेषणों के माध्यम से एक ही अद्वैत तत्त्व का निरूपण किया जा रहा है।


इस प्रकार, इस भाष्यांश में शंकराचार्य यह सिद्ध करते हैं कि

ब्रह्म न केवल स्थूल और सूक्ष्म शरीर से रहित है, बल्कि कारण-शरीर (अविद्या) से भी परे है;

और वह सभी कर्मजन्य बंधनों से मुक्त, शुद्ध और निरपेक्ष सत्ता है।


इस भाष्यांश में ब्रह्म के तीनों शरीरों के निषेध के साथ उसकी पूर्ण शुद्धता और कर्मातीतता का प्रतिपादन किया गया है। “अपापविद्धम्” के द्वारा धर्म-अधर्म से परे उसकी स्थिति स्पष्ट होती है, और व्याकरणिक संकेत से यह दिखाया गया है कि सभी विशेषण एक ही अद्वैत तत्त्व की ओर इंगित करते हैं। इस प्रकार, ब्रह्म निरुपाधिक, निष्कलंक और सर्वथा स्वतंत्र सत्ता है—यही शांकर वेदान्त का निष्कर्ष है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment