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Monday, 27 April 2026

रूह जो आईना बन गई

 रूह जो आईना बन गई


विघटन के बाद

कुछ भी पहले जैसा नहीं बचता


न नाम,

न कहानी,

न वह “मैं”

जो हर बात में बीच में आ खड़ा होता था…


मगर

सब कुछ खत्म भी नहीं होता…


कुछ बचता है

बहुत महीन,

बहुत खामोश…


जैसे राख के नीचे

धीमी-सी कोई आंच…


उसी में

मैंने पहली बार

रूह को छुआ


वो

कोई चीज़ नहीं थी,

कोई रूप नहीं…


बल्कि

एक साफ़-सुथरी सतह


जिस पर

कुछ भी टिकता नहीं,

मगर

सब कुछ साफ़ दिख जाता है…


रूह

आईना बन गई थी


मगर

यह वैसा आईना नहीं था

जो चेहरा लौटाता है…


यह

वजूद लौटाता था…


तुम उसके सामने खड़े नहीं होते

तुम

उसमें घटते हो…


तुम्हारी हँसी,

तुम्हारा डर,

तुम्हारी चालाकियाँ

सब कुछ

बिना आवाज़

उभरता है…


और अजीब बात


वो

किसी को जज नहीं करती…


न सुधारती है,

न बचाती है…


बस

दिखाती है…


इतनी साफ़

कि झूठ

अपने आप गिरने लगता है…


मैंने

उस रूह-आईने में

खुद को देखा


मगर इस बार

कोई चेहरा नहीं था…


बस

लहरें थीं


कभी उठती हुई,

कभी गिरती हुई…


और उन लहरों के पीछे

एक अडोल-सा सन्नाटा…


तभी समझ आया


मैं

लहर नहीं हूँ…


मैं

वो भी नहीं

जो लहर को देख रहा है…


मैं

शायद

वही सन्नाटा हूँ


जिसमें

सब कुछ आता है,

और

बिना निशान छोड़े

चला जाता है…


रूह का आईना

टूटता नहीं


क्योंकि

उसमें पकड़ने लायक

कुछ होता ही नहीं…


और शायद

इसीलिए

वो सबसे खतरनाक है


क्योंकि

वो तुम्हें

तुम्हारे किसी भी झूठ में

रहने नहीं देता…


अब

मैं उससे भागता नहीं


मगर

उसमें ठहरना

अब भी आसान नहीं…


क्योंकि

हर बार

कुछ न कुछ

छूट जाता है…


और जो बचता है

वो

और भी हल्का,

और भी खाली…


मगर

अजीब तरह से

और भी सच्चा…


शेर:


रूह जब आईना बनी—तो चेहरा कहीं रहा नहीं,

मैं मिटता ही गया—मगर कुछ भी कम हुआ नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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