केनोपनिषद् — सम्बन्ध-भाष्य (वाक्य-भाष्य)
(२) आत्मजिज्ञासा एवं कर्म-विरोध का प्रतिपादन
मूल संस्कृत पाठ
विषयजिज्ञासोः केनेषितमित्यात्मस्वरूपतत्त्वविज्ञानायायमध्याय आरभ्यते । तेन च मृत्युपदमज्ञानमुच्छेत्तव्यं तत्तन्त्रो हि संसारो यतः । अनधिगतत्वादात्मनो युक्ता तदधिगमाय तद्विषया जिज्ञासा । कर्मविषये चानुक्तिः तद्विरोधित्वात् । अस्य विजिज्ञासितव्यस्याऽऽत्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम् । कस्मादिति चेदात्मनो हि यथावद्विज्ञानं कर्मणा विरुध्यते । निरतिशयब्रह्मस्वरूपो ह्यात्मा विजिज्ञापयिषितः । “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदम्” इत्यादिश्रुतेः । नहि स्वाराज्येऽभिषिक्तो ब्रहात्वं गमितः कश्चन नमितुमिच्छति, अतः ब्रह्मास्मीति संबुद्धो न कर्म कारयितुं शक्यते । न ह्यात्मानम् ॥
1. सरल हिन्दी रूपान्तरण
जो साधक (जिज्ञासु) सत्य को जानना चाहता है, उसके लिए “केनेषितम्…” से आरम्भ होने वाला यह अध्याय आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए शुरू किया गया है।
इस ज्ञान से अज्ञान (जो मृत्यु और जन्म-मरण का कारण है) को नष्ट करना आवश्यक है, क्योंकि यही अज्ञान संसार का मूल कारण है।
चूँकि आत्मा अभी जानी नहीं गई है, इसलिए उसे जानने की जिज्ञासा करना उचित है। इसीलिए यहाँ आत्मा के विषय में प्रश्न उठाया गया है।
यहाँ कर्म के विषय में कुछ नहीं कहा गया है, क्योंकि कर्म आत्मज्ञान के विपरीत (विरोधी) है। यदि पूछा जाए कि ऐसा क्यों है, तो उत्तर है—आत्मा का सही ज्ञान कर्म के साथ मेल नहीं खाता।
आत्मा वास्तव में निरतिशय (जिससे बड़ा कुछ नहीं) ब्रह्मस्वरूप है। श्रुति भी कहती है—“उसी को ब्रह्म जानो, यह जो दिखाई दे रहा है वह नहीं है।”
जैसे कोई राजा बन जाने के बाद फिर छोटा पद नहीं चाहता, वैसे ही जो “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा जान लेता है, उसे फिर कर्म करने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता।
2. दार्शनिक विश्लेषण (Research-level)
(A) विषय-निर्धारण
यह अंश मुख्यतः निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित है:
• आत्मजिज्ञासा (Self-inquiry) की आवश्यकता
• अज्ञान = संसार का कारण
• कर्म और ज्ञान का विरोध
• आत्मा का ब्रह्मस्वरूप
(B) “विषयजिज्ञासोः… अध्याय आरभ्यते”
• “केनेषितम्” प्रश्न से अध्याय का आरम्भ
• लक्ष्य → आत्मस्वरूप का तत्त्वज्ञान
यह जिज्ञासा-प्रधान उपनिषद् है
(C) “मृत्युपदमज्ञानम्”
• अज्ञान = मृत्यु का कारण
• “तत्तन्त्रो हि संसारः” → संसार अज्ञान पर आधारित
अद्वैत सिद्धान्त:
अज्ञान = बन्धन का मूल
(D) “अनधिगतत्वादात्मनः”
• आत्मा अभी प्रत्यक्ष नहीं जानी गई
• इसलिए जिज्ञासा आवश्यक
यह “अध्यात्म-प्रमाण की आवश्यकता” को दर्शाता है
(E) “कर्मविषये चानुक्तिः”
• यहाँ कर्म की चर्चा नहीं की गई
कारण:
• “तद्विरोधित्वात्” → कर्म ज्ञान के विपरीत है
(F) ज्ञान–कर्म विरोध
शंकर का मूल सिद्धान्त:
• कर्म → कर्तृत्व (doership) पर आधारित
• ज्ञान → अकर्तृत्व (non-doership) का बोध
इसलिए:
दोनों एक साथ अन्तिम स्तर पर संभव नहीं
(G) “निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आत्मा”
• आत्मा = सर्वोच्च ब्रह्म
• उससे ऊपर कुछ नहीं
श्रुति प्रमाण:
“तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि…”
(H) “ब्रह्मास्मीति संबुद्धः”
• जब साधक जान लेता है “मैं ब्रह्म हूँ”
तब:
• कोई इच्छा शेष नहीं
• कोई कर्तव्य नहीं
(I) दृष्टान्त (राजा का उदाहरण)
• जैसे राजा बनने के बाद कोई छोटा पद नहीं चाहता
• वैसे ही ब्रह्मज्ञानी कर्म में प्रवृत्त नहीं होता
यह “पूर्णता (pūrṇatā)” का संकेत है
3. मीमांसा vs वेदान्त
• मीमांसा → कर्म अनिवार्य
• अद्वैत → ज्ञान के बाद कर्म असंगत
निष्कर्ष:
ज्ञान और कर्म का अन्तिम समुच्चय असम्भव
4. निष्कर्ष
यह अंश प्रतिपादित करता है:
• आत्मज्ञान ही लक्ष्य है
• अज्ञान ही संसार का कारण है
• कर्म आत्मज्ञान के विपरीत है
• ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने पर कर्म का कोई स्थान नहीं रहता
मुकेश ,,,,,,,,,
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